04-Jan-2019 06:19

गीतकार के तौर पर खास पहचान बनायी अनिल मिश्रा बेला ने

आज बादलों ने फिर साज़िश की जहाँ मेरा घर था वहीं बारिश की अगर फलक को जिद है ,बिजलियाँ गिराने की तो हमें भी ज़िद है ,वहि पर आशियाँ बनाने की

जाने माने गीतकार अनिल मिश्रा बेला ने चिकित्सा के साथ गीत-संगीत के क्षेत्र में भी अपनी अलहदा पहचान बनायी है। अनिल मिश्रा ने अपने अबतक के अपने करियर के दौरान कई चुनौतियों का सामना किया और हर मोर्चे पर कामयाबी का परचम लहराया। बिहार के भोजपुर जिले के बेला गांव के रहने वाले अनिल मिश्रा के पिता स्वर्गीय सुरेश मिश्रा और उनकी मां स्वर्गीय कामता देवी घर के लाडले बड़े बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना देखा करती। हालांकि बचपन के दिनों से ही उनका रूझान गीत-संगीत की ओर था और मशहूर शायर और गीतकार गुलजार से प्रभावित रहने के कारण वह उन्हीं की तरह गीतकार बनने का ख्वाब देखा करते। अनिल मिश्रा जब महज तीन वर्ष के थे तब उनका पूरा परिवार मुंबई आ गया जहां उनके पिता एक निजी कंपनी में काम करते थे। मुंबई में अनिल मिश्रा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की।इसी दौरान अनिल मिश्रा के पिता की मौत हो गयी और वह अपने परिवार के साथ अपने पैतृक गांव बेला आ गये। मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद घर की आर्थिक हालत ठीक नही होने के कारण अनिल मिश्रा को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोडनी पडी।

वर्ष 1985 अनिल मिश्रा , सविता देवी के साथ शादी के पवित्र बंधन में बंध गये। परिवार की जिम्मेवारी अनिल मिश्रा के नाजुक कंधो पर आ गयी और वह औरगांबाद के हसपुरा चले गये और वहां एक निजी क्लीनिक में बतौर कंपाउडर काम करने लगे। कुछ वर्षा तक वहां काम करने के बाद बेहतर भविष्य की तलाश में अनिल मिश्रा उतर प्रदेश चले गये। उत्तर प्रदेश में अनिल मिश्रा ने वर्ष 1994 तक अलग-अलग निजी अस्पतालों में बतौर कंपाउंडर काम किया। जिंदगी में कुछ पाना हो तो खुद पर ऐतबार रखना सोच पक्की और क़दमों में रफ़्तार रखना कामयाबी मिल जाएगी एक दिन निश्चित ही तुम्हें बस खुद को आगे बढ़ने के लिए तैयार रखना।

अनिल मिश्रा बतौर गीतकार अपना करियर बनाना चाहते थे। इसी को देखते हुये। आंखो में बड़े सपने लिये वह वर्ष 2003 में राजधानी पटना आ गये। पटना आने के बाद अनिल मिश्रा को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ज़िन्दगी हसीं है ज़िन्दगी से प्यार करो हो रात तो सुबह का इंतज़ार करो वो पल भी आएगा जिस पल का इंतज़ार है आपको बस खुदा पे भरोसा और वक़्त पे ऐतबार करो अनिल मिश्रा की मेहनत रंग लायी और उन्हें अजय पांडेय और ममता पांडेय की आवाज में अपना पहला गाना लिखने का अवसर मिला। यह गाना होली पर आधारित था। इसके बाद अनिल मिश्रा को वर्ष 2004 में देवी गीत चल थावे नगरिया गीत लिखने का अवसर मिला। इस गीत की सफलता के बाद अनिल मिश्रा बतौर गीतकार अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गये। इसके तुरंत बाद अनिल मिश्रा को देवी गीत आर्शीवाद देवी मइया की गीत लिखने का अवसर मिला जिसके लिये उन्हें काफी ख्याति मिली। अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल हम वो नहीं कि जिन को ज़माना बना गया अनिल मिश्रा वर्ष 2010 में एनएसआई वीडियो ग्लैमर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ गीतकार के पुरस्कार से सम्मानित किये गये। बहुमुखी प्रतिभा के धनी अनिल मिश्रा ने गीत लिखने के साथ ही कई फिल्मों के संवाद और कहानी भी लिखी है। इन फिल्मो में रस बरसे डोमकच की रात में , तिरंगा पाकिस्तान में , पिरतिया टूटे ना , जब से नैना लड़ल , धर्मयुद्ध , साजन ,दुल्हनियां हिंदस्तानी और खनके कंगना तोहरे अंगना जैसी कई फिल्में शामिल है। खास बात है कि खनके कंगना तोहरे अंगना में अनिल मिश्रा ने अभिनय भी किया है।

रवीन्द्र कुमार के निर्देशन में बनी यह फिल्म जल्द ही प्रदर्शित होने वाली है।अनिल मिश्रा भले ही काम की व्यस्तता की वजह से अपने पैतृक गांव बेला से दूर हो गये हैं लेकिन वह अपने नाम के साथ बेला को जोड़े हुये हैं। अनिल मिश्रा बेला को उनके करियर के दौरान कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। अनिल मिश्रा अपनी सफलता का श्रेय अपने परिवार और शुभचिंतकों के साथ ही रौशन जमाल , रवीन्द्र कुमार और शांदिल इशान को देते हैं जिन्होंने उन्हें हर कदम सपोर्ट किया। अनिल आने वाली पीढ़ी को हर समय मदद के लिये तत्पर रहते हैं। अनिल उन्हें मोटीवेट कर कहते हैं। टूटने लगे हौसले तो ये याद रखना, बिना मेहनत के तख्तो-ताज नहीं मिलते, ढूंढ़ लेते हैं अंधेरों में मंजिल अपनी, क्योंकि जुगनू कभी रौशनी के मोहताज़ नहीं होते…

04-Jan-2019 06:19

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