26-Apr-2018 08:08

धार्मिक उन्माद फैलाकर अपराधी पैदा करने की होड़

पुलिस अब दोस्त ना रहे, समाज के सेवक ना रहें, वो अब बन गये हैं अपराधी तैयार करने के फैक्ट्री

राजनीतिक दलों, सत्ता दलों एवं पुलिस प्रशासन के संयुक्त मिली भगत के माध्यम से बढ़ रहे अपराध और आम आदमी बन रहा अपराधी। कहते हैं ना कि राजनेता की दोस्ती भी अच्छी नहीं, दुश्मनी तो और भी अच्छी नहीं और यह दोनों ना हो तो आम आदमी बनों और राजनेताओं की भक्ति में जीवन समर्पित कर दो। राजनेताओं की भक्ति का आलम का आँकड़े देखने हो तो अपने आसपास के घरों, मुहल्लों, कस्बों में देखों। एक आम सा दिखने वाला बच्चा आज अपराधी होगा। जिसे आप कभी नहीं सोच़े होगें वह आज पुलिस को देखकर भाग रहा है। क्यों जानते हो आप ????? शायद नहीं और शायद नहीं इसलिए क्योंकि आप उसमें दिलचस्पी नहीं ले रहे हों। राजनीति के स्तर में गिरावट बहुत पहले से आ गई थी। उस समय भी अपराधी बनाये जाते थे, लेकिन कुछ रिश्तों की मर्यादा हुआ करती थी। आज पिछले कुछ सालों में अपराधियों द्वारा राजनीति का भी पुँजी करण कर दिया। वहीं इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत के सदनों में बैठे सांसदों, विधायकों में लगभग 35-40% पर अपराधिक मामलों में दोषी है। वहीं कुछ 20% सामान्य अपराध के कैटेगरी में शामिल है। कुछ सालों पहले एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ घोटाले, काला धन, धन संग्रह और लुट- झूठ का खेला। भारत के सर्वोच्च पद पर पदस्थापित होने वाले महान माननीय लोगों ने झूठ की ऐसी खेती शुरू की कि उसका फसल आज चार साल बाद भी तैयार नहीं हुआ। इस झूठ की खेती पर जो उपज हुआ और बाजारों में परोसा गया वह है अपराध और जेल का खेल। राष्ट्र वाद और धर्म वाद ने भारत के असंख्य टुकड़े कर 2014 लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, लेकिन शासक बदला। तरीका वहीं लूट खसोट और सामाजिक अपराध को हजारों गुना बढ़ाकर आम जीवन को जीने लायक नहीं छोड़ा। सबसे ज्यादा चुनाव में जिन बातों के बल पर 2014 लोकसभा चुनाव जीता गया, वहीं अब जी का जंजाल बन गया। कानूनी पचरें ऐसे बढ़े है कि आम आदमी और आम नवयुवक आज अपराधी हैं। जिस हिंदुत्व के नाम पर प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल कि गई वहीं सहयोगियों को जुमलामैन गुण्डा बात गये। जिसके कारण देश के गली मोहल्लों में एक एक ना जाने देश में कितने हिंदू संगठन बन गये और उनका मुखिया, प्रधान सेवक ही पल्टी मार गया। जिसका खामियाजा भुगत रहे हैं भारत के लगभग युवा। 2014 लोकसभा चुनाव के बाद और देश में पहली बार प्रधानमंत्री के जगह चौकीदार चुना गया, हिंदू गतिविधियों के कारण 20% से ज्यादा मुकदमा हिंदू संगठन पर हुए हैं। वह वहीं संगठन या व्यक्ति है जो प्रधान सेवक चुनने के लिए वोट माँगता फिरता था। आपराधिक घटनाओं का रूख बदल दिया गया और भारत के युवाओं को रोजगार के जगह पर अपराधियों की लाईन में लग दिया गया। जिसका सबसे सुंदर लाभकारी फायदा हुआ है तमाम जिला प्रशासन और सबसे सबल हुए हैं पुलिस अधीक्षक और उनके थानाध्यक्ष। थानाध्यक्ष के माध्यम से अपनी तरफ उठने वाली सभी हाथों को काटने की व्यवस्था राजनीति दल बखूबी कर रहे हैं। जिन्हें पैसा देकर खड़ा किया था, उन्हीं को मोहरा बनाकर पैसे वसूली का माध्यम पुलिस और थानों के माध्यम से कराया जाता हैं। यह सिर्फ एक आकलन नहीं हैं यह सर्वे है भारत के 200 जिलों का , जो बताते हैं कि हिंदू संगठन पर कितना आतंक किया गया है। विशेष सूत्रों की माने तो पुलिस आज क्षेत्रिय स्तरों पर एक एक थाना क्षेत्र से लाखों की लूट विभिन्न विभिन्न क्षेत्रों से उगाही कर रहे हैं। शराब और शबाब पुरानी बात है, इससे एक कदम बढ़कर बालू, दारू, दलाली, धर्म वाद के नाम पर आम आदमी को परेशानी में डालना। यह विचारों को जब साझा करता हूँ तो सवाल उठने लगते हैं कि पुलिस अधीक्षक और पुलिस पर सीधी टिप्पणी नहीं करें, मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पुलिस की मुश्किलें बढ़ रही हैं यह दलाल मानने को तैयार नहीं हैं। उदाहरण के लिए लिया जाए तो वैशाली जो हमारा अपना जिला हैं , उसमें पिछले लगभग एक सालों में पुलिस के वरिय अधिकारियों के साथ थानाध्यक्ष और पुलिस बलों की कई बार पिटाई हुई हैं। जिसमें बालू माफियाओं ने तीन-चार बार कई दर्जन पुलिस को पीटा, जिसमें वरिय अधिकारी भी शामिल हुए। वहीं शराब के मामलों में भी कई बार थानाध्यक्ष स्तरों को पिटाई का सामना करना पड़ा हैं। वहीं जुआरियों के अड्डों पर कई छापेमारी हुई, जैसे बालू और दारू में, लेकिन यहाँ भी हालत वहीं के वहीं रहे हैं। आज वैशाली जिला में जिला प्रशासन और पुलिस अधीक्षक किसी भी आम जनता के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं । दारू व्यवसाय, बालू व्यवसाय और जुआ व्यवसाय से कई लाखों का व्यापार फल फूल रहा है। इसका प्रमाण पत्र मैं क्या दूँ : गाँधी चौक, थाना चौक, दिग्घी कला पूर्वी और पश्चिमी में, बलवा कुंवारी, जढ़ुआ, तेरसिया, दियर, कौनहारा, यह तो 10% शहरी क्षेत्रों में सदैव सभी व्यवसाय फलता फूलता नजर आएगा। सभी जगहों पर से कमीशन में कुछ छापेमारी के बाद 30% - 50% तक बढ़ी हैं। इसमें दो राय नहीं है कि हत्या, बलात्कार, अपहरण जैसी घटनाओं में पिछले कुछ सालों में बेईतहा बढ़ोतरी हुई हैं। वैशाली जिला प्रशासन और पुलिस अधीक्षक अपनी नैतिकता को भूलकर शानदार वातानुकूलित घरों में सो रहे हैं। आप जिंदा हैं तो अपने भाग से, मर गये तो भारतीय संविधान पुलिस अधीक्षक को अधिकार दिया है कि आपके शरीर के टुकड़े टुकड़े कराकर ही परिवार को देंगे। वैशाली पुलिस अब आम जनता के लिए नहीं हैं, ये नौकरशाह अपने को मालिक समझ रहे हैं। इन्हें याद रखने की जरुरत है कि हम एक आम आदमी ही नहीं भारत की अर्थव्यवस्था के सबसे बड़ी पूँजी हैं, जहाँ से आपको महिने की सैलरी भुगतान होती हैं। पुलिस रक्षा के लिए है ना कि आम आदमी को अपराधी बनाने के लिए, इसलिए आम आदमी अपना रास्ते खुद तय करें। शाम में घर वापस आ गये तो आप अपने को खुशनसीब समझों। वैशाली पुलिस सदैव अपराधियों के साथ हैं।

26-Apr-2018 08:08

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