16-Jun-2019 12:27

भारतीय रेलवे भी बुलेट ट्रेन के इंतजार में .....

इसलिए व्यवहारिक और सामान्य नहीं चलती भारतीय रेलवे, कहीं अच्छे दिन तो बाधक नहीं ?

अच्छे दिन की बातें करना ही अब बेमानी सी लगती हैं, जब लोकतंत्र में लोग गायब हो गये और तंत्र के बल पर भारत की सत्ता को रेंगाया जा रहा है। रोज रोज यह सुनकर दिल दिमाग काम करना बंद कर दिया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के बल पर देश का गौरव बढ़ा हैं और भविष्य में इसके फायदे भी नज़र आयेंगे। विदेश नीतियों की वज़ह से देश में पहला बुलेट ट्रेन चलेगा। आज देश में लगभग इस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में 150 योजनाओं का लगभग अरबों रुपये के विज्ञापनों के माध्यम से आम आदमी के लिए दिखलाया गया। लेकिन आज तक किसी योजना को धरातल पर पहुँचे 30-40% तक नहीं देख पाया। वहीं रोजाना एक पर एक योजनाओं की नई सुची दिखाई देती हैं और उसके साथ लगा होता हैं एक ही नारा राष्ट्रवाद। राष्ट्रवाद के बाद अगर कोई भारतीय जो 5-10 दिन से भूखा हैंं और योजनाओं के लाभ की इच्छा रखी कि उसे राष्ट्रवाद के नाम पर राष्ट्रद्रोही घोषित करने में सरकारें देरी नहीं करती हैं।

राष्ट्रवाद तो सरकार की नाकामयाबी के लिए राष्ट्रद्रोह के रूप में जनप्रतिनिधियों पर मुकदमे दायरे करने से पूरा होगा। आज हम कुछ घटनाओं की चर्चा से अवगत कराते हैं जो भारत सरकार के द्वारा संचालित भारतीय रेलवे से जुड़ी हैं। कैसे भारतीय रेल आम आदमी को बीच मझधार में छोड़कर भाग निकलती हैं। भारतीय रेल सेवक की जगह लूटेरे के रूप में काम कर रही हैं। भारतीय रेलवे को अभी सशक्त माध्यम से निर्मित करने की जरूरत है। जिससे आम जनता और खास व्यक्ति के बीच की दूरी कम किया जा सकें। ना कि चुनावों के माध्यम से जुमलेबाजी करते हुए आम आवाम़ के दर्द को पाटने का काम किया जाएगा। नये भारत की लगातार बातें भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते रहते हैं। दावों में नरेंद्र मोदी से जीत पाना मुश्किल ही साबित होगा, लेकिन अगर जैसा भाषणों में कहते हैं 650 जिलों से ज्यादा का दौड़ा कर चुके हैं तो उस स्थिति में भारत को बुलेट ट्रेन की जगह साधारण ट्रेन का समय पर चल जाना ही महत्वपूर्ण और सुखदायी होता।

लेकिन 70 साल, 70 साल की जुमलेबाजी से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत की आम आवाम़ को राष्ट्रवाद और नेहरू के नाम पर ही ठग्गा जाता रहेंगा। उदाहरण यह है जो नया नहीं है, पर इसी 70 साल की जंग को हटाने के वादें होते रहे हैं। आज तक ऐसी शायद ही कोई बिहार के लिए ट्रेन होगी जो अपने निर्धारित समय पर स्टेशनों पर आ जाती होगी। बिहार कितना भी आधुनिक क्यों ना हो जाए, पर उसके कोई दूर के भी रिश्तेदार ट्रेन से आने वाले होंगे तो वह भारत के किसी कोने में हो वह स्टेशन पहुँच ही जाता हैं। लेकिन आज तक कोई ट्रेन निर्धारित समय पर स्टेशन नहीं आई होगी। फिर भी बिहारी इंतजार करता है और अपने सामर्थ्य के अनुसार उनका सम्मान करता है। बिहारी दौलत तो अपनों की खुशी में ही खोज लेता है, इसलिए ट्रेन के सफ़र को सुखद बनाने के लिए बिहार स्टेशनों पर अपने रिश्तों को मजबूती प्रदान करने के लिए पहुँचते हैं। उसी कुछ खास रिश्तों को मजबूती प्रदान करने का अवसर प्राप्त हुआ तो भारतीय रेलवे ने अपना इतिहास दुहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बहुत कम मौके देखने को मिलता हैं कि देर से आने वाली ट्रेनों के रास्ते बदल दिये जाते हैं, लेकिन इतना नहीं किया बीच मझधार में 80-90 साल के लोगों को छोड़ कर रास्ते बद दें।

एक ट्रेन उदना गुजरात से 09027 नंबर ट्रेन खुलती है और पाटलिपुत्र होते हुए हाजीपुर के रास्ते बरौनी जाती हैं। लगभग देखा जाता हैं कि बिहार के लिए ट्रेनें देर से ही चलती हैं, उसी तरह यह भी देर ही चलती हैं। कुछ समय पहले हाजीपुर के लिए निर्धारित समय से 4 घंटे लगभग देरी से रात 3:30 में पाटलिपुत्र स्टेशन से रास्ता बदलकर पटना पहुँची और बरौनी पहुँच गई। एक लगभग 85 साल के बुजुर्ग मतदान करने के उद्देश्य से मुजफ्फरपुर आने के लिए थे और हाजीपुर उतर कर मुजफ्फरपुर जाते। जिनके लिए एक रिश्तेदार पुरी रात हाजीपुर स्टेशन पर बैठा रह गया ताकि बुजुर्ग रिश्तेदार को भटकना ना पड़े। लेकिन अचानक पता चला कि ट्रेन ही नहीं आ रही हैं। अब रात तीन बजे ना पटना पहुँच पाते तो बुजुर्ग व्यक्ति ने किसी तरह समान लिए स्टेशन के बाहर निकल आँटो पकड़कर, बस स्टेंड पहुँच, मुजफ्फरपुर के लिए बस लिये। वहीं कुछ एकसप्ताह पहले सुबह 11 बजे हाजीपुर पहुँचने वाली ट्रेन अचानक पटना के माध्यम से गंतव्य स्थान पर चल दी। उसमें पुरा परिवार एक मासूम छह महीने की बच्ची जो भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जुमलेबाजी से अंजान हैं, वह भी इस गरम मौसम में दर दर भटककर घर तक पहुँची। नरेंद्र मोदी को राष्ट्रवादी व्यवस्था समझनी ही हैं तो आम आवाम़ की आम जरूरतों को समझना पड़ेगा। लेकिन नरेंद्र मोदी जो सत्ताभोगियों के रूप में 20 वर्षो से राष्ट्रवाद के नाम पर देश के युवाओं को गुमराह और अपराधी बना रहे हैंं। शायद ही संभव हो कि अगले आने वाले पाँच साल जुमलेबाजी की नींव और गहरी खाई के रूप में ना बदल जाए। और अच्छे दिन की चाह फिर राष्ट्रवाद की बलि चढ़ जाए।

16-Jun-2019 12:27

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