08-Jun-2019 09:05

शराब के नशे में पुलिस और संपोषित करती खुद की अर्थव्यवस्था ताकि परिवार मजबूत हो

शराब की 25 ट्रकों में केवल 1 ट्रक पकड़ती बिहार पुलिस और 24 ट्रक शराब में अर्थशास्त्र की पढ़ाई।

बिहार में शराब बंदी करने का बिहार सरकार का फैसलें को हर किसी ने सराहा। एक महिला के कह देने मात्र से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दुबारा सत्ता प्राप्त करते ही निर्णय लेने में देरी नहीं की। खुब सुर्खियों में रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, तो वहीं प्रशासनिक अधिकारियों की भी बल्ले बल्ले हो चला। आज पुलिस की बिहार की बागडोर संभाले पुलिस महानिदेशक ने शराब बंदी पर खुब रोड शो से लेकर युवाओं के साथ थक जाने पर दो घुट जिंदगी के नाम पर शराब का सेबन करने में गुरेज़ नहीं किया। जिनके कंधों पर प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने की है वह संरक्षक की भूमिका में आज भी नज़र आते हैं। शराब हो या अपराध किसी पर कामयाबी हासिल नहीं कर पाने वाले को बिहार का सबसे महत्त्वपूर्ण पद जो पुलिस की व्यवस्था को बदने और मजबूती के लिए होता हैं, एक नाकामयाब व्यक्ति को देने से व्यक्तिवादी विकास और राजनीतिक दलों का सहयोग प्राप्त कर सरकार को ही चुनौती प्रदान कर रहे हैं।

आज हर घर दारू योजना जितनी सफ़ल दिख रही हैं, उतनी आसानी से नोटबंदी भी सफ़लता नहीं पाई थी। जब नीतीश कुमार बिहार की गद्दी पर भाजपा जैसी साधुत्वादी सोच़ के साथ काम करना शुरू किया तो हर घर दारू सही समय पर पहुँचे, इसके लिए प्रत्येक गाँव -गाँव में दुकान खुलवाया। बिहार में पहली बार NDA की सरकार बनी और भोजन, कपड़ा, मकान, दवा की जगह पर दारू योजना से बिहार की तरक्की का मार्ग प्रसस्त हुआ। ऐसा शायद ही घर होगा, जो दारु योजना का लाभ ना लिया हो, 20% वैसे परिवार को छोड़कर जो संस्कार और संस्कृति से बड़े हुए थे। लेकिन NDA की सरकार इस बात में सफ़लता पाई कि नशे की हालत में ही राष्ट्रवाद को तैयार किया जा सकता हैं, इसलिए युवाओं का नशे में होना राष्ट्रहित में है।

बिहार सरकार के मुल संचालक के रूप में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो दुसरी तरफ़ उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी हमेंशा जदयू और भाजपा को मजबूती प्रदान की। कभी सरकार एक व्यक्तिवादी नहीं हुआ जैसा आज पुरा NDA नरेंद्र मोदी के चेहरे पर टीकी हुई हैं। फिर भी एक बातें समझ नहीं आती कि NDA की सरकार में पुरे बिहार को नशे में धकेला गया और जंगल राज के संस्थापक राजद के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में बिहार में पूर्ण रूप से शराब बंदी की गई। शराब बंदी का आलाम यह रहा कि आम जनता को तो छोड़िये, पुलिस वाले दारू के बगैर मरने लगें। कितने विधायक और सांसद आज तक चोरी चोरी पीते हैं। लेकिन नीतीश कुमार की कार्यशैली ने उन्हें एक मजबूत नेता के रूप में भारत में स्थापित कर ही दिया, लेकिन कथनी और करनी यही हैं कि कागजों पर जो दारू बंद हैं वह वैसे गरीबों के लिए जो 100/- की बोतल की कीमत 1000/- नहीं दे सकता। जो दे सकता है वह तो पी रहा हैं और इसमें प्रत्येक दोपहर और शाम के समय पुलिस की ही सही जाँच हो जाए, तो 40% पुलिस वाले नशे में ही मिल जाएंगे।

खैर, बहुत बढ़िया है कि बिहार में शराब बंदी कम-से-कम कागजों पर तो हैं। लेकिन यह सवाल खड़ा फिर भी है कि जब बिहार पुलिस ना तो अपराध रोक पा रही हैं और ना ही दारू के आने वाली ट्रकों के खेप। तो इस बात के लिए आखिर जिम्मेदार जनता हैं जो पैसा खर्च कर पी लेती हैं और पुलिस को पैसा ना दे पाती तो उसकी गिरफ्तारी हो जाती हैं। बहुत जरूरी हैं कि बिहार में शराब बंद हैंं तो लोगों को कानून का सम्मान करना अनिवार्य समझा जान चाहिए। लेकिन जब बिहार में शराब बंद हैं तो शराब आता कहाँ से हैं। अगर पुलिस पैसे लेकर ही व्यापार कर रही हैं तो गिरफ्तारी किसकी होती हैं। और अगर पुलिस इसमें नहीं है तो आजतक जो शराब पकड़े गये, उस कंपनियों पर कार्यवाई क्यों नहीं हुई। अगर कंपनी शराब बिहार के लिए नहीं भेजती तो यहाँ उनकी कंपनियों के शराब उपलब्ध कैसे हो जाता हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार सिर्फ़ पुलिस के माध्यम से शराब का बिजनेस शुरू कर पैसा बना रही हैं। अगर सरकार नहीं करा रही हैं तो पुलिस को संरक्षण क्या पुलिस महानिदेशक, पटना के द्वारा दिया जाता हैं। यह स्पष्ट करने की जिम्मेदारी जितनी बिहार सरकार की है उतनी ही पुलिस महकमेंं की भी हैं। शराब पीने के लिए मिल रहा है तो इसके लिए बिहार सरकार और उसकी पुलिस टीम हैं।

08-Jun-2019 09:05

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