24-Dec-2019 10:25

भगवान् श्री रामजी और भक्त श्री हनुमानजी की पहली मुलाकात का प्रसंग!

* आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक पर्बत निअराया॥ तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा॥

* आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक पर्बत निअराया॥ तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा॥ माता सीता की खोज करते हुए,श्री रघुनाथजी फिर आगे चले। ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया। वहाँ (ऋष्यमूक पर्वत पर) मंत्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। अतुलनीय बल की सीमा श्री रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी को आते देखकर- हनुमानजी स्वयं यह समझ नहीं पायें कि भगवान् आये हैं, हनुमानजी ने देखा कि कोई दो राजकुमार आये हैं लेकिन पहचान नहीं पाये हैं और सीधा प्रश्न किया। * को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा ॥ कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी॥ भावार्थ:-हे वीर! साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं?॥ * मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता ॥ की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ॥ भावार्थ:-मन को हरण करने वाले आपके सुंदर, कोमल अंग हैं और आप वन के दुःसह धूप और वायु को सह रहे हैं क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश- इन तीन देवताओं में से कोई हैं या आप दोनों नर और नारायण हैं॥

* जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार। की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार॥ भावार्थ:-अथवा आप जगत्‌ के मूल कारण और संपूर्ण लोकों के स्वामी स्वयं भगवान्‌ हैं, जिन्होंने लोगों को भवसागर से पार उतारने तथा पृथ्वी का भार नष्ट करने के लिए मनुष्य रूप में अवतार लिया है। श्री हनुमानजी ने प्रश्नों की झडी लगा दी, भगवान सम्मुख खडे हैं, और हनुमानजी पूछ रहे हैं कोन हो तुम? "नर-नारायण या जग कारन तारन भव, भंजन धरनी भार" कितने प्रश्न किये? प्रभु मुस्कुराये, यहां हनुमानजी वेश बदलकर आये हैं भगवान ने थोडा भ्रम पैदा कर दिया। भगवान् ने सिधे उत्तर नहीं दिये, हनुमानजी ने जितने प्रश्न किये थे नर, नारायण जग तारण जितने प्रश्न थे सब काट दियें, प्रश्नों को काटकर बिल्कुल उल्टा उत्तर दिया, हनुमानजी ने जितने प्रश्न किये थे भगवान् श्रीरामजी ने सब प्रश्न काट दियें, और भगवान् कहते हैं। * कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए॥ नाम राम लछिमन दोउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई॥ भावार्थ:-(श्री रामचंद्रजी ने कहा-) हम कोसलराज दशरथजी के पुत्र हैं और पिता का वचन मानकर वन आए हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुंदर सुकुमारी स्त्री थी॥

* इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही॥ आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥ भावार्थ:-यहाँ (वन में) राक्षस ने (मेरी पत्नी) जानकी को हर लिया। हे ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिए ॥ भगवान् कहना चाहते हैं कि हम निराकार नहीं है, दशरथजी के पुत्र हैं, जग कारण, तारण भव, हम जग के कारण से नहीं आयें हैं बल्कि पिता की आज्ञा से आये हैं, पिता के कारण आयें हैं, ब्रह्म तो व्यापक होता है लेकिन हमारी जानकीजी को कोई हरण करके ले गया है, हम तो उन्हें खोज रहे हैं, क्योंकि व्यापक को तो कोई वियोग नहीं होता, हम तो वियोग में घूम रहे हैं। लेकिन जैसे ही भगवान् के श्रीमुख से निकला कौसलेस तो हनुमानजी को तुरन्त भगवान् के वरदान की याद आ गई कि कौसलेस के यहाँ तो मेरे प्रभु रामजी अवतार लेनेवाले है क्या वहीं भगवान् इस समय? भगवान् ने कहा तुमने नाटक तो किया लेकिन तुम फेल हो गये, तुम ब्राह्मण बनकर आये लेकिन तुम ब्राहमण थे नहीं यह भूमिका तुम ठीक से नहीं निभा पायें, हनुमानजी ने पूछा कैसे नहीं निभा पाया? प्रभु पहिचानि परेऊ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना।। प्रभु बोले ब्राह्मण कभी क्षत्रिय को प्रणाम नहीं करता और हम क्षत्रीय वेश में तुमने आकर सिर झुका कर हमको प्रणाम किया, तभी हम समझ गये कि तुम असली ब्राह्मण नहीं हो सकते, दोनों का अविस्मरणीय रसमय वार्तालाप, रामचरित मानस में तुलसीदासजी ने यहाँ अमृत भर दिया है, भक्त और भगवान् का मिलन पूर्ण आनन्द देने वाला है।

हम भी इस आनन्द का रसास्वादन कर सकते हैं, हनुमानजी महाराज को गुरु बना कर, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि ब्रह्म और जीव के बीच में गुरु होते हैं, जैसे वर और कन्या के बीच में पुरोहित होते हैं बन्धन के लिये, गठबंधन (विवाह) के लिये, ऐसे ही जीव और ब्रह्म के बीच जो गठबन्धन का कार्य करते हैं वो गुरु करते हैं। जैसे माँ बालक का परिचय कराती है, देखो बेटा यह तुम्हारे मामाजी है, चाचाजी है, ताऊजी है, फुफाजी हैं, ऐसे ही गुरूदेव है जो जीव को भगवान् का परिचय कराते हैं, उनका अनुभव कराते हैं, लेकिन हमारा अहंकार गुरु का दर्शन नहीं होने देता और यह प्रश्न आज का नहीं है यह प्रश्न हर युग में उठाया गया है, ऐसा नहीं है कि कलयुग का मनुष्य बहुत दुष्ट है और सतयुग का मनुष्य बहुत अच्छा रहा हो। मनुष्य की मनोस्थिति हर युग में एक जैसी है, गुरु का अर्थ है- गुरु माने किसी के हो जाना किसी के चरणों में शीश झुकाना, मैरी बुद्धि जो मैरे अनुसार चलती थी हे गुरूदेव! अब मैं इसे आपको समर्पित करता हूँ, अब यह मैरे अनुसार नहीं चलेगी बल्कि आपके अनुसार चलेगी, भाई-बहनों! इसी भावना से, कोमल ह्रदय से जो साधक गुरु के श्रीचरणों में अपने आप को समर्पित कर दें, भगवान् की उस पर कृपा दृष्टि अवश्य रहती है।

24-Dec-2019 10:25

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