06-Oct-2019 06:55

🌸 जीवन में करे संवर की साधना : आचार्यश्री महाश्रमण 🌸

आचार्यवर ने प्रदान की त्याग की प्रेरणा, विशिष्ट जनों ने किए शांतिदूत के दर्शन

तीर्थंकर प्रतिनिधि तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता-शांतिदूत-अहिंसा यात्रा महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपने मंगल पाथेय में फरमाया कि हमारे जीवन में सत्कर्म, असत्कर्म और निष्कर्म यह तीन अवस्थाएं होती है। जीवन में किए गए अच्छे कार्य सत्कर्म, बुरे कार्य असत्कर्म और जहां दोनों प्रवृत्तियों का निरोध के हो वह निष्कर्म अवस्था होती है।निष्कर्मता या संवर की साधना के द्वारा अशुभ कर्मों के पुद्गलों के बंधन को रोका जा सकता है। संवर की अवस्था में एक अवस्था ऐसी आती है जहां पूर्वकृत कर्म टूट जाते हैं और आत्मा मोक्ष की ओर प्रस्थित हो जाती है। दरवाजे को बंद करने के बाद कोई भीतर नहीं आ सकता है उसी प्रकार संवर के माध्यम से जब कर्मों का अवरोध कर दिया जाता है तो आत्मा नए कर्म चिपकने बंद हो जाते हैं और एक अवस्था ऐसी आती है जब पुराने कर्म झड़ जाते हैं। संवर की साधना करने से निष्कर्मता की साधना स्वतः ही हो जाती है।

संस्कार निर्माण शिविर में संभागी बालक बालिकाओं को विशेष प्रेरणा देते हुए आचार्य प्रवर ने कहा कि एक समय में दो काम करने का लक्ष्य ना रखें। जहां तक संभव हो भोजन करते समय टीवी और मोबाइल से बचने का प्रयास करें। अगर भोजन के समय इनका परित्याग किया जाए तो एक प्रकार से संयम की साधना कुछ अंशों में हो सकती है। बालक शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि बच्चों में अगर संस्कार सही रूप में पुष्ट हो जाए तो इनमें से भी कोई बड़ा व्यक्तित्व बन जा सकता है। छोटे बालक में सत्संस्कार प्रवाहित कर सही रूप से तराशा जाए तो इनमें से भी कोई हीरा बन सकता है। गृहस्थों को उत्प्रेरित करते हुए कहा कि गृहस्थ जीवन में भी संयम की चेतना पुष्ट होनी चाहिए।

व्यक्ति को पान मसाला, गुटखा, जर्दा आदि से बचने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में त्याग और संयम का बहुत महत्व होता है। तेरापंथ वरिष्ठ नागरिक सम्मेलन में संभागी श्रावकों को संबोधित करते हुए कहा कि व्यक्ति को यह प्रयास करना चाहिए कि उनकी वृद्धावस्था अभिशाप न बनकर वरदान बने और उन्हें अपने जीवन में निष्कर्मता की साधना करनी चाहिए। व्यवसाय आदि से निवृत्त होकर धर्म ध्यान और समाज के धार्मिक कार्य में अपना समय देना चाहिए। प्रतिदिन अनुप्रेक्षा सामायिक और नाती-पोतों को संस्कारी बनाने का प्रयास करना चाहिए। वृद्धावस्था में गुस्से का परिहार करना चाहिए क्योंकि गुस्से से अप्रीति का भाव आता है। साध्वी प्रमुखा कनकप्रभाजी ने अपने उद्बोधन में विद्यार्थियों को प्रेरणा देते हुए कहा कि विद्यार्थी सद्गुणों के प्रति लक्ष्य निर्धारित करें तो वे जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। स्वभाव में चंचलता भले ही रखे परंतु जीवन का सर्वांगीण विकास उनका लक्ष्य रहना चाहिए। अभिभावक भी इस बात का ध्यान रखें कि वे अपने बच्चों को प्रतिदिन 15 मिनट का समय देकर उनमें आध्यात्मिक विकास करने का प्रयास करें।

प्रमुखाश्रीजी ने आगे फरमाया कि व्यक्ति जीवन में बड़ा बनने का प्रयास करें परंतु दूसरों को नीचा न दिखाकर अपना स्वयं का स्तर ऊंचा कर बड़ा बने। प्रवचन में उपस्थित न्यायमूर्ति श्री गौतम चंद चोरड़िया ने अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए कहा कि आचार्य प्रवर की नई सोच और नये चिंतन से संपूर्ण धर्म संघ लाभान्वित हो रहा है और आज का यह वरिष्ठ नागरिक सम्मेलन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। वरिष्ठ हड्डी विशेषज्ञ डॉ राघवेंद्र एवं भारत सरकार के जीएसटी संयुक्त आयुक्त श्री देवराज ने वक्तव्य दिया। प्रवास व्यवस्था समिति के महामंत्री श्री दीपचंद नाहर कोषाध्यक्ष श्री प्रकाशचंद लोढ़ा ने उपस्थित अतिथियों का सम्मान किया। वरिष्ठ नागरिक सम्मेलन में दिन भर चले विभिन्न सत्रों में अनेक विषयों पर प्रशिक्षण दिया गया सभी वरिष्ठ श्रावकों का सम्मान किया गया।

06-Oct-2019 06:55

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