19-Jan-2020 09:47

जीवन में संतुलित प्रकृति से ही खुलेंगे सफलता और खुशी के द्वार

हमारी सभी भावनाएं हमारे शरीर व मन पर प्रतिबिंबित होती है, ईर्ष्या और भय के कारण चेहरा पीला पड़ जाता है तो प्रेम से चमक उठता है

ज्ञान दर्शन : (परमहंस योगानंद) स्वस्थ शरीर में ही सुंदर मन बसता है, इसलिए शरीर की उपेक्षा करना समझदारी नहीं, जीवन की भागदौड़ में लोग अपने शरीर के प्रति सबसे अधिक लापरवाही बरतते हैं, लेकिन शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यक्ति को गलत आहार की अपेक्षा सही आहार लेना चाहिए, आहार के साथ-साथ परिवेश भी आपके शरीर पर प्रभाव डालता है ….. यदि आपको ऐसे व्यक्तियों के बीच रहना पड़े, जो आपको विक्षुब्ध कर देते हों, तो आपको अपना परिवेश बदल लेना चाहिए लेकिन उससे भी अधिक अच्छा तब होगा, जब आप अपने मानसिक परिवेश को ही बदल लें, अपना विश्लेषण करें …..

स्वयं की प्रवृत्ति को बदलें, अपनी प्रवृत्ति बदल लेने से आपको कभी दूसरों से कष्ट नहीं होगा, आप देखेंगे कि आपके आसपास के ज्यादातर लोग परेशान दिख रहे हैं, कुछ लोग ईर्ष्या के कारण तो कुछ लोग बीमारी, क्रोध, घृणा या दूसरे मनोभाव के कारण परेशान हैं, वे अपनी आदतों और भावनाओं के कारण परेशान है …..

हमारी सभी भावनाएं हमारे शरीर व मन पर प्रतिबिंबित होती है, ईर्ष्या और भय के कारण चेहरा पीला पड़ जाता है तो प्रेम से चमक उठता है, जिस दिन लोग अपनी प्रवृत्ति बदलना सीख जाएंगे, उस दिन वे अपने सारे दुःखों से मुक्त हो जाएंगे …..

हमें अपनी वास्तविक प्रकृति का विश्लेषण करने का प्रयत्न करना चाहिए और इसके परिणाम स्वरूप सर्वोत्तम गुणों का विकास करना चाहिए, व्यक्तियों को आत्म नियंत्रण सीखना चाहिए, अन्यथा वे पदार्थ के मात्र गतिमान टुकड़ों के समान है, जब तक आप बौद्धिक, भौतिक और आध्यात्मिक रूप से एक संतुलित प्रकृति का विकास नहीं कर सकते, तब तक विकास में सहभागी नहीं हो सकते, यही वास्तविक सफलता और प्रसन्नता की कुंजी है !!!!!!!!!

19-Jan-2020 09:47

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