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01-Jan-2020 05:39

धर्म के पाथेय का संचय करो : आचार्य महाश्रमण

सूर्यग्रहण के बीच भी गतिमान रहा अध्यात्म का महासूर्य, चलकेरे में भव्य स्वागत, आज फिर बीस से ज्यादा किलोमीटर की पदयात्रा, 26-12-2019, गुरुवार, गोल्लारहट्टी, कर्नाटक

पांव-पांव हजारों किलोमीटर पैदल चलने वाला अध्यात्म के महासूर्य आचार्य महाश्रमण आज सूर्य ग्रहण के बीच भी अनवरत गतिमान रहे। सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति-इन तीनों आयामों से युक्त अहिंसा यात्रा के महानायक आचार्यश्री सूर्यग्रहण के कारण धुंधलाए वातावरण की परवाह किए बिना लगभग 16 किलोमीटर पैदल चलकर गोल्लारहट्टी में स्थित गवर्नमेन्ट प्राइमरी स्कूल में पधारे। विद्यालय के समीप आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित जनता को उद्बोधन देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि हमारी दुनिया में किसी को कोई अपना शत्रु मान सकता है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को, एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को अपना शत्रु मान सकता है और शत्रु के निमित्त से नुकसान भी हो सकता है। शास्त्रकार ने कहा कि गला काटने वाला शत्रु इतना नुकसान नहीं करता, जितना नुकसान स्वयं की दुरात्मा बनी हुई आत्मा करती है। गला काटने वाला व्यक्ति इस जीवन का नाश कर सकता है, किन्तु दुरात्मा स्वयं का इतना नुकसान कर सकती है कि कई जन्मों तक कष्ट पाना पड़े। पापों में रत आत्मा दुरात्मा और धर्म में संलग्न आत्मा सदात्मा होती है। दुरात्मा स्वयं की शत्रु और सदात्मा स्वयं की मित्र होती है। दुुरात्मा व्यक्ति को मौत निकट होने पर चिंताग्रस्त हो सकता है कि मेरी अगली गति कैसी होगी। इसलिए आदमी को अपने जीवन काल में ही पाप कर्माें से बचने और यथासंभव धर्माराधना करने का प्रयत्न करना चाहिए।

धर्म के दो प्रकार हैं-उपासनात्मक और आचरणात्मक। दोनों प्रकार के धर्म का अपना-अपना महत्त्व है। जो व्यक्ति समयाभाव के कारण सामयिक आदि ज्यादा न कर सके, उसे भी अपना आचरणों को अच्छा रखने का प्रयास तो करना ही चाहिए। आदमी को अहिंसा और ईमानदारी को आत्मसात करने का प्रयत्न करना चाहिए। उसे ज्यादा गुस्सा नहीं करना चाहिए। परिवार के मुखिया को कभी-कभी परिजनों को कुछ कहना पड़ सकता है, लेकिन हर समय नहीं कहना चाहिए। कहने की बात सम्यक् तरीके से शांति के साथ कही भी जा सकती है। बार-बार आवेश में बोलने से परिवार के सदस्यों में बड़ो के आंख की शर्म कुछ कम हो सकती है। इसलिए हमेशा हर बार पर आवेश में आकर डांटने-टोकने की अपेक्षा शांति से यथावसर कहने की बात कहनी चाहिए।

इस जीवन में सुख-सुविधा, मान-सम्मान प्राप्त है तो मानना चाहिए कि यह पूर्वकृत पुण्याई का फल है। व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि आगे के लिए कुछ संचय हो रहा है या नहीं। किसी व्यक्ति को जंगल की यात्रा करनी हो और वह अपने साथ में खाद्य और पेय सामग्री साथ ले जाए तो मार्ग में भूख-प्यास लगने पर वह सामग्री काम में आ सकती है। इसी प्रकार जो व्यक्ति इस जीवन में पाथेय का संचय कर लेता है, वह आगे दुःखी बनने से बच सकता है, सुखी रह सकता है।

आचार्यश्री ने कहा कि व्यस्त होना एक बात है लेकिन अस्त-व्यस्त होना अलग बात है। व्यस्त होते हुए भी मस्तिष्क में तनाव नहीं रहना चाहिए। आचार्यश्री सायंकाल गोल्लारहट्टी से प्रस्थान कर 6.5 किलोमीटर की पदयात्रा कर चल्लकेरे पहुंचे, जहां सकल जैन समाज के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। आज की कुल यात्रा 22.5 किलोमीटर की हो गई।

01-Jan-2020 05:39

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