22-Dec-2019 09:35

भगवान सूर्य

वेदो और पुराणों में सूर्य देव की महिमा को विस्तार से बताया गया है |

हिन्दू धर्म में विविधता है , यहा देवी देवता भी बहुत से है | इन्ही में से एक देवता है सूर्य देव जो साक्षात दर्शन देते है और व्यक्ति , पेड़ पौधो और जानवरो को जीवन प्रदान करते है | अन्धकार को दूर करने वाले और रोशनी देने वाले सूर्य देवता के बिना किसी का भी जीवन अपूर्ण है | वेदो और पुराणों में सूर्य देव की महिमा को विस्तार से बताया गया है |

कैसे हुआ भगवान सूर्य का जन्म ? ___________ एक बार देवता और दानवो के युद्ध में देवता पराजित हो गये थे | देव माता अदिति बहुत उदास हुई और उन्होंने तब देवताओ के स्वर्ग वापसी के लिए घोर तपस्या की , उन्हें वरदान मिला की भगवान् सूर्य उन्हें विजय दिलवाएंगे और वे अदिति के पुत्र रूप में जल्द ही अवतार लेंगे | समय आने पर सूर्य देवता का जन्म हुआ और उन्होंने देवताओ को असुरो पर विजय दिलवाई | सूर्य के माता पिता और परिवार भगवान सूर्य के पिता का नाम महर्षि कश्यप थे और उनकी माँ अदिति थी | अदिति के गर्भ से जन्म लेने के कारण इनका नाम आदित्य भी पड़ा | इनके जयकारे और आरती में कश्यप नंदन भी आता है |

सूर्य की पत्नी और पुत्र पुत्रियाँ : भगवान सूर्य की दो पत्नियाँ बताई गयी है एक संज्ञा और दूसरी छाया | इनके पुत्र मृत्यु के देवता यमराज और शनिदेव जी है जिन्हें मनुष्यों के ऊपर न्याय के लिए कार्य दिया गया है | इनके अलावा यमुना, तप्ति, अश्विनी तथा वैवस्वत मनु भी सूर्य की ही संताने है | मनु को पहला मनुष्य माना जाता है | सूर्य देवता की सवारी – सात घोड़ो वाला रथ भगवान सूर्य का वाहन सात घोड़ो वाला एक रथ है जिसके सारथी अरुण देव है | सूर्य देवता इस रथ में सवार है और सम्पूर्ण जगत में प्रकाश फैला रहे है |

सूर्य को वेदों में जगत की आत्मा कहा गया है।समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है, यह आज एक सर्वमान्य सत्य है। वैदिक काल में आर्य सूर्य को ही सारे जगत का कर्ता धर्ता मानते थे। सूर्य का शब्दार्थ है सर्व प्रेरक.यह सर्व प्रकाशक, सर्व प्रवर्तक होने से सर्व कल्याणकारी है। ऋग्वेद के देवताओं कें सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद ने "चक्षो सूर्यो जायत" कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है। छान्दोग्यपनिषद में सूर्य को प्रणव निरूपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का लाभ बताया गया है। ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उतपत्ति का एक मात्र कारण निरूपित किया गया है। और उन्ही को संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है। सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते है। सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं। अत: कोई आश्चर्य नहीं कि वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। पहले यह सूर्योपासना मंत्रों से होती थी। बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ तो यत्र तत्र सूर्य मन्दिरों का नैर्माण हुआ। भविष्य पुराण में ब्रह्मा विष्णु के मध्य एक संवाद में सूर्य पूजा एवं मन्दिर निर्माण का महत्व समझाया गया है। अनेक पुराणों में यह आख्यान भी मिलता है, कि ऋषि दुर्वासा के शाप से कुष्ठ रोग ग्रस्त श्री कृष्ण पुत्र साम्ब ने सूर्य की आराधना कर इस भयंकर रोग से मुक्ति पायी थी। प्राचीन काल में भगवान सूर्य के अनेक मन्दिर भारत में बने हुए थे। उनमे आज तो कुछ विश्व प्रसिद्ध हैं। वैदिक साहित्य में ही नहीं आयुर्वेद, ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्रों में सूर्य का महत्व प्रतिपादित किया गया है।

22-Dec-2019 09:35

धर्म मुख्य खबरें

समाचार भारत_दर्शन राजनीति खेल जुर्म शिक्षा चिकित्सा धर्म परम्परा व्यक्तित्व कला सम्मान फिल्म सामाजिक_संस्थान रोजगार कानून अर्थव्यवस्था समस्या पर्यावरण सैनिक पुलिस गांव शहर ज्योतिष सामान्य_प्रशासन जन_संपर्क छात्र_छात्रा
Copy Right 2020-2025 Ahaan News Pvt. Ltd. || Presented By : CodeLover Technology