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17-Jan-2020 12:39

भगवान हनुमानजी द्वारा मुख का सदुपयोग - डॉ0 विजय शंकर मिश्र

वर्णन आता है कि राहु का रंग है काला और पवनदेव सूर्यजीका उज्वल। राहु यह चेष्टा करता है कि भले ही हम ज्ञान (सूर्य) को सदा के लिए न मिटा सकें पर थोड़े समय के लिए इसे ग्रस कर अंधेरा तो अवश्य फैला सकते हैं ।

भगवानहनुमान जी की भूख इतनी प्रबल है कि जब वे अशोक वाटिका में माताश्री सीताजी के पास गए तब उन्होंने यह नही कहा कि मुझे भूख लगी है , अपितु कहा कि -" सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा।" अति भूख भी नहीं ,अपितु अतिसय भूख शब्द का प्रयोग किया । माँ ने पूछा - यह भूख के साथ अतिशय का क्या अर्थ ? तो हनुमान जी ने कहा माँ ! सत्य तो यह है कि मैं जन्मजात भूखा हूँ । इस संदर्भ में बडी प्रसिद्ध कथा है, जब भगवानहनुमान जी का जन्म हुआ तो लाल लाल सूर्य दिखाई पडा और भगवानहनुमान जी ने उसको फल समझकर खा लिया। प्रश्न यह है कि क्या सचमुच भगवानहनुमानजी इतने नासमझ थे कि उन्होंने पवनदेव सूर्यजी को फल समझ लिया ? और जिस पर्वत पर भगवानहनुमान जी थे क्या उसके आसपास फलों के वृक्ष नहीं थे ?

यद्यपि पर्वत पर तो अनेकानेक फल युक्त वृक्ष थे और यदि उनका फल तोड़ना चाहते तो यह बात ठीक होती । पर इसके स्थान पर सूर्य रूपी फल को खाने के लिए उन्हें कितनी लम्बी छलाँग क्यों लगाना पड़ी ? यदि विचार करके देखें तो हमें स्पष्ट प्रतीत होगा कि जिसने एक छलाँग लगाकर सूर्य को मुँह में धारण कर लिया हो वे भगवानहनुमान जी कितने विलक्षण हैं और उनकी भूख कोई साधारण नहीं है। इतना ही नहीं फल खाने पर देवराज इंद्र ने वज्र से उन पर प्रहार भी कर दिया , तथा भगवानहनुमान जी को मूर्छित होना पडा। पर जब बाद में पवन देवता के द्वारा प्राण - वायु की गति रुकने लगी तो फिर सारे देवताओं ने क्षमा- याचना की तथा भगवानहनुमान जी को वरदान दिये । भगवानहनुमानजी द्वारा इस प्रकार कार्य करने का तात्पर्य क्या है? इस पर थोड़ा विचार कर लिया जाय।

वस्तुत: भगवानश्री हनुमानजी ने किसी भ्रम के कारण पवनदेव सूर्यजी को फल नहीं समझा था।' फल' के बारे में हम पढ़ते ही हैं अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष से चार फल माने जाते हैं । भगवान हनुमानजी यदि चाहते तो उन्हें 'अर्थ 'का फल उन्हें सरलता से प्राप्त हो जाता । काम तथा धर्म का फल भी वे प्राप्त कर लेते । परन्तु पास वाले फलों की ओर भगवानहनुमान जी मे हाथ नहीं बढ़ाया , इसका अर्थ है कि उन्हे ज्ञान की भूख है, प्रकाश की भूख है। संसार की वस्तुओं की भूख उनके जीवन में नहीं है , वे तो केवल चरम फल के लिए छलाँग लगाते हैं। भगवानश्री हनुमानजी सचमुच छलाँग लगाना जानते हैं। उनकी प्रत्येक छलाँग अनोखी है। जब उनकी पहली छलाँग तो सूर्य तक पहुंच गए। दूसरी छलाँग लंका की दिशा में लगाई तो माता श्रीसीताजी तक पहुंच गये। तीसरी छलॉंग में प्रभुलक्ष्मण जी के लिए दवा लेने द्रोणाचल पर्वत पर पहुंच गए और चौथी छलॉंग लगी तो लंका से सीधे अयोध्या पहुंच गये। हमारे लिए तो सीढी से चढ़ना ही उपादेय है । व्यक्ति यदि यह सोचे कि मुझे अर्थ, धर्म तथा काम का फल नहीं चाहिए , मुझे तो केवल मोक्ष चाहिये यह उचित नहीं हैं ।साधारण व्यक्ति भगवान श्री हनुमान जी का अनुसरण करके छलाँग तो लगा दे , पर अगर छलॉंग सही न लगी तो वह नीचे भी गिर जाएगा। इसलिये भगवानहनुमान जी की भूख मानें," सुमति- छुधा" अर्थात् ज्ञान तथा प्रकाश की भूख। भगवानहनुमान जीने पवनदेव सूर्यजी को मुख में धारण कर लिया इसका भी अर्थ दूसरा था।हमारे पुराणों में कथा आती है कि ठीक उसी समय सूर्य ग्रहण लगने वाला था । समय पाकर ग्रहण लगता है और पवनदेव सूर्यजी का प्रकाश छिप जाता है ।इसका अर्थ है कि पवनदेव सूर्यजी के साथ भी राहु की समस्या है । यह राह मात्सर्य तथा ईर्ष्या वृत्ति का परिचायक है । वर्णन आता है कि राहु का रंग है काला और पवनदेव सूर्यजीका उज्वल। राहु यह चेष्टा करता है कि भले ही हम ज्ञान (सूर्य) को सदा के लिए न मिटा सकें पर थोड़े समय के लिए इसे ग्रस कर अंधेरा तो अवश्य फैला सकते हैं ।

भगवान हनुमान जी के जन्म के समय जब राहु पवनदेव सूर्यजी की ओर बढ रहा था उसी समय भगवान हनुमान जी छलाँग लगाकर पहुँचे और उन्होंने पवनदेव सूर्यजु को मुँह मे धारण कर लिया । लोगों को लगा कि उन्होंने पवनदेव सूर्यजीको खा लिया पर विवेकी व्यक्ति समझ गये कि खा नहीं लिया अपितु राहु के द्वारा खाए जाने से पवनदेव सूर्यजी को बचा लिया , क्योंकि भगवान हनुमान जी अगर मुख में न लेते तो राहु मुख में ले लेता। भगवानश्री हनुमान जी ज्ञान का फल मुख में धारण करते हैं , इसका सीधा सा तात्पर्य है कि जब वेदमंत्रों तथा श्लोकों का पाठ किया जाएगा तो मुख से ही तो किया जाएगा। इसलिये कहा जा सकता है कि मुख का जितना बढिया उपयोग करना भगवान श्री हनुमान जी जानते हैं , दूसरा भला क्या जानेगा।जिन्होंने जन्म लेते ही पवनदेव सूर्यजी को मुख मे धारण कर लिया। जब दूसरी छलाँग लगाने लगे तो उस समय प्रभुश्रीरामजी ने मुद्रिका दी और प्रभु - मुद्रिका लेते ही-- " प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं" उसे मुख में धारण कर लेते है। इसका अभिप्राय क्या है कि पवनदेव सूर्यजी को भी मुख में धारण करते हैं और ' राम -नाम' को भी मुख में धारण कर लेते है। तात्पर्य यह है कि भगवान हनुमान जी महाराज ज्ञान (सूर्य) और भक्ति (रामनाम अंकित मुद्रिका) दोनों को मुख मे धारण करते है। मुख का इससे अच्छा सदुपयोग और क्या हो सकता है l

17-Jan-2020 12:39

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