21-Oct-2019 08:38

भ्रष्टाचार रूपी अंधेरे में अणुव्रत दीपक के समान : आचार्यश्री महाश्रमण

शांतिदूत ने साधना से सहजानंद प्राप्त करने की प्रदान की प्रेरणा, अणुव्रत महासमिति के अधिवेशन का शुभारंभ, 21-10-2019 सोमवार , कुम्बलगोडु, बेंगलुरु, कर्नाटक।

तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता-शांतिदूत, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अपने मंगल प्रवचन में फरमाया कि व्यक्ति को भीतर का आनंद और बाह्य पदार्थों का आनंद दोनों को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। बाह् आनंद के लिए बाहरी साधनों का और भीतरी आनंद अर्थात् सहजानंद प्राप्त करने के लिए साधना रूपी प्रयत्न करना पड़ता है। भीतरी आनंद पाने के लिए बाहर खोज की अपेक्षा नहीं है। भीतरी आनंद हर व्यक्ति के भीतर रहता है परंतु ज्ञान के अभाव में वे उससे परिचित नहीं हो पाते हैं और उसका आनंद नहीं ले पाते हैं। मोहनीय कर्म का जितना अभाव होगा उतना ही भीतरी आनंद का प्रभाव रहेगा और मोहनीय कर्म का अगर प्रभाव रहा तो भीतरी आनंद का अभाव हो जाएगा। आचार्य प्रवर ने सभी को मन की चंचलता कम करने और कर्मों को क्षीण करने की साधना में आगे बढ़ कर सुमंगल साधना और ग्यारह प्रतिमा की साधना के लिए उत्प्रेरित किया।

आचार्य प्रवर ने अणुव्रत अधिवेशन के शुभारंभ उपलक्ष में फरमाते हुए कहा कि जिस प्रकार मकान की सफाई रोज करनी पड़ती है उसी प्रकार आत्मा की सफाई भी निरंतर करते रहना चाहिए। हर काल में भ्रष्टाचार और अनैतिकता रही है। चारों ओर फैली अनैतिकता को देखकर निराश नहीं होना चाहिए और निरंतर प्रकाश से अनैतिकता के अंधकार को मिटाने के लिए प्रयत्न रहना चाहिए। अणुव्रत को एक दीपक के समान बताते हुए आचार्यवर ने फरमाया कि घने अंधेरे में एक नैतिकता रूपी छोटे दीपक की रोशनी प्रकाशमान कर सकती है। आचार्य प्रवर ने उपस्थित जनसमुदाय को नैतिकता को मिटाने के लिए हाथ पर हाथ धरकर बैठने और देखने की बजाए निरंतर प्रयत्न कर उन्हें मिटाने के लिए पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दी। आचार्य तुलसी द्वारा प्रदत अणुव्रत आंदोलन संपूर्ण भारतवर्ष में अनैतिकता को मिटाने के लिए प्रयासरत हैं। आचार्य प्रवर ने सभी संस्थाओं के पदाधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि अपराध बढ़ने का एक कारण अर्थ को बताते हुए कहा कि अनैतिकता से कमाया पैसा किसी संस्था के विकास में नहीं लगना चाहिए। सभी को आर्थिक सुचिता के संकल्प लेने की प्रेरणा दी। विभिन्न सभा संस्थाओं के पदाधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि व्यक्ति पद मुक्त भले ही हो जाए परंतु जब तक उसकी क्षमता रहती है उसे कार्यमुक्त नहीं होना चाहिए और निरंतर कार्य करते रहना चाहिए। अणुव्रत महासमिति एवं समिति को निर्देशित करते हुए कहा कि समय-समय पर विचार गोष्ठियों करते रहना चाहिए क्योंकि अच्छे विचारों से आचार और व्यवहार भी बदल जाते हैं।

प्रवचन कार्यक्रम के दौरान मुनि श्री रजनीश कुमारजी, साध्वी धवलप्रभाजी और साध्वी शरदप्रभाजी के संयम जीवन के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आचार्य प्रवर ने उन्हें निरंतर साधना में रत रहने की एवं आगम स्वाध्याय करने की प्रेरणा दी। साध्वी प्रमुखा कनकप्रभाजी ने अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि अणुव्रत का मुख्य उद्देश्य है स्वस्थ परिवार और स्वस्थ समाज की रचना करना। यह तभी संभव हो सकता है जब अणुव्रत के आदर्शों पर आस्था रहे और इस मार्ग पर चलने का प्रयास करते रहे। साध्वीप्रमुखा जी ने संयम जीवन की रजत जयंती मना रहे सभी साधु साध्वियों को संयम में रत रहकर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और उनके आध्यात्मिक जीवन की मंगल कामना की।

प्रवचन में अणुव्रत महासमिति के अध्यक्ष श्री अशोक संचेती ने अधिवेशन के शुभारंभ कल सभी का स्वागत किया। अणुव्रत समिति सदस्यों द्वारा गीत की प्रस्तुति हुई। अणुव्रत अधिवेशन की संयोजिका श्रीमती शांति सकलेचा ने संचालन किया। आचार्य श्री महाश्रमण के दर्शनार्थ भाजपा राष्ट्रीय संगठन महासचिव BL सन्तोष जी, कर्नाटक भाजपा के उपाध्यक्ष निर्मल जी सुराणा एवं महानगरपालिका (BBMP) के नव मनोनीत मेयर गौतम जी मकाणा ने दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

21-Oct-2019 08:38

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