05-Oct-2019 11:53

शांतिदूत ने प्रदान की भौतिक सुखों से विरक्ति की प्रेरणा

वेदनीय, नाम, कर्म और आयुष्य यह चार कर्म पुण्य और पाप दोनों में समाहित रहते हैं

तीर्थंकर प्रतिनिधि, तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता-शांतिदूत-अहिंसा यात्रा के प्रणेता-महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी में अपने मंगल प्रवचन में फरमाया कि कर्म के दो प्रकार होते हैं पुण्य और पाप। वेदनीय, नाम, कर्म और आयुष्य यह चार कर्म पुण्य और पाप दोनों में समाहित रहते हैं। पुण्य अपने आप में कर्म है परन्तु मुक्ति के लिए इससे भी दूर होना पड़ता है।

पूण्य एक प्रकार से सभी कर्मों से मुक्त होने में बाधा की तरह होता है क्योंकि आत्मा को मुक्त होने के लिए सभी प्रकार के कर्मों से निवृत्त होना पड़ता है। व्यक्ति कर्मों से मुक्ति के लिए साधना करें। धर्म की आराधना निर्जरा और संवर के लिए हो तो मुक्ति के मार्ग स्वतः ही खुल जाते हैं। भौतिक सुखों के लिए किए गए पुण्य आगे दुख प्रदान करते हैं। जिस प्रकार तलवार की धार पर लगा शहद चाटने से कुछ क्षण के लिए जीह्वा मीठी होती है परंतु तलवार से कटने के बाद वह दुख बढ़ जाता है उसी प्रकार भौतिक सुखों के लिए कार्य किया जाए तो उसका परिणाम कष्टदायी होता है और क्षणिक सुख के साथ बड़ा दुख साथ में आ जाता है।

आचार्य प्रवर ने एक कथानक फरमाते हुए कहा कि साधु संत व्यक्ति को लोभ से दूर रहकर कर्म निर्जरा की प्रेरणा देते हैं और व्यक्ति लोभ में आसक्त होकर सत्पथ की ओर बढ़ नहीं पाता है और एक दिन मनुष्य जीवन रुपी शाखा टूट जाती है और और उसकी आत्मा इसी संसार में परिभ्रमित होती रहती है। आचार्य प्रवर ने संस्कार निर्माण शिविर में उपस्थित बालक बालिकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि पुण्य से मुक्ति नहीं मिलती ।

संवर और निर्जरा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। पूज्य प्रवर ने आगे फरमाते हुए कहा कि नौ तत्वों में पुण्य पाप आश्रव और बंध हेय अर्थात् यह छोड़ने लायक होते हैं। संवर और निर्जरा को उपादेय बताते हुए इनकी आराधना करने की प्रेरणा दी। प्रवचन से पूर्व आचार्य प्रवर ने उपस्थित जनमेदिनी को नवान्व्हिक अनुष्ठान के अंतर्गत जप करवाया।

05-Oct-2019 11:53

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