28-Oct-2019 10:17

सदा दिवाली संत की - आचार्य महाश्रमण

हिंसा के अंधकार को अहिंसा के प्रकाश से मिटाने की प्रदान की पावन प्रेरणा, नवदीक्षित पांच साधुओं को बड़ी दीक्षा प्रदान की, चतुर्दशी के अवसर पर किया परंपरागत हाज़री का वाचन, 27-10-2019 रविबार , कुम्बलगोडु, बेंगलुरु, कर्नाटक।

तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता-शांतिदूत-अहिंसा यात्रा के प्रणेता-महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने दिवाली के पावन अबसर पर अपने मंगल प्रवचन में फरमाया कि हिंसा एक प्रकार का अंधकार है और अहिंसा प्रकाश का मार्ग है। हिंसा रुपी अंधकार मिट जाए तो अहिंसा रुपी प्रकाश फैल जाता है। प्राणियों की हिंसा वह व्यक्ति करता है जो भीरू और शक्तिविहीन होता है। अहिंसा शौर्य का प्रतीक है। शौर्यवान व्यक्ति ना स्वयं की हिंसा करता है ना दूसरों की हिंसा करता है। अहिंसा के पालन के लिए अभय का भाव होना भी आवश्यक होता है। भीरुता के भाव के कारण व्यक्ति हिंसा में प्रवृत्त हो जाता है। मृषावाद में उलझ जाता है। आचार्य प्रवर ने फरमाया कि जहां अभय है वहां आनंद है भीरु और शौर्यविहीन व्यक्ति हिंसा की ओर प्रवृत्त हो जाता है। आचार्य प्रवर ने अभय के विकास के लिए "णमो जिनाणं जियभयाणं" की 12 माला 12 महीने फेरने के लिए सभी को प्रेरित किया।

दीपावली महापर्व के विषय में फरमाते हुए कहा कि त्यौहारों से जनता में उल्लास व आनंद के भाव पुष्ट होते हैं और दीपावली एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो भगवान महावीर व राम से संबंधित है। साधु के बारे में दीपावली की व्याख्या करते हुए कहा कि साधु के तो सदा दीपावली रहती है और आठों पहर आनंद रहता है। जब मन में मैत्री समता की भावना रहे तो हमेशा आनंद ही आनंद रहता है। अमावस्या के महत्व के संबंध में फरमाते हुए कहा कि इस रात के साथ भगवान महावीर का निर्वाण और भगवान राम का नाम जुड़ने से यह विशिष्ट हो गई है। दीप मालिका के विषय में फरमाते हुए कहा कि दीपक प्रकाश करते हैं और एक दीपक से अनेक दीपक प्रकाशमान होते रहते हैं। आचार्य तुलसी-महाप्रज्ञजी द्वारा अनेक दीक्षाएं प्रदान हुई है। उनके द्वारा दीक्षित व्यक्ति संयम रूपी दीपक से जगत में प्रकाश फैला रहे हैं। साधु-साध्वियों को प्रेरित करते हुए कहा कि 32 आगम 32 दीपक के समान हैं। सभी दीपकों को एक साथ जलाना मुश्किल हो तो प्रतिवर्ष एक आगम रुपी दीपक जलाने से 32 वर्षों में संपूर्ण दीपमालिका प्रज्ज्वलित बन जाएगी। बाहरी दीपक आंखों को आकर्षित लग सकते हैं परंतु हमारे भीतर में ज्ञान व विवेक का प्रकाश हो तो हमारी चेतना भी जग जाएगी। चतुर्दशी के अवसर पर आचार्य प्रवर ने हाजिरी का वाचन करवाया एवं सात दिन पूर्व नवदीक्षित पांच साधु-साध्वियों को बड़ी दीक्षा प्रदान की।

बड़ी दीक्षा के संबंध में फरमाते हुए कहा कि उस दिन परिषद बङी थी पर आज जो दीक्षा होने जा रही है वह दीक्षा बङी है। इस अवसर पर आचार्यवर ने पांच महाव्रतों का विस्तृत वर्णन करते हुए सभी नवदीक्षित साधु- साध्वियों को बड़ी दीक्षा प्रदान की। साध्वीप्रमुखा श्री कनकप्रभा जी ने अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि ज्ञान का दीपक सर्वश्रेष्ठ होता है स्वयं को दीपक बनाने के लिए ज्ञान दर्शन और चरित्र की साधना करने की प्रेरणा दी। प्रमुखाश्रीजी ने फरमाया कि भौतिक दीपक से बाहरी प्रकाश होता है परंतु आंतरिक प्रकाश के लिए साधना का दीपक जलाना होता है। दृष्टिकोण के सम्यक होने से ज्ञान का दीपक जल जाता है. दीपावली महापर्व आचार्य श्री महाश्रमण जी से विशेष रूप में जुड़ा हुआ है क्योंकि इस दिन आचार्य महाप्रज्ञ जी ने आचार्य तुलसी के समक्ष अपने पट्टधर का नाम एक पत्र में लिखकर धर्म संघ का भविष्य निश्चिंत कर दिया था।

साध्वी विश्रुतविभाजी ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि नव दीक्षित अपने भाव की शुद्धि करें और अपने जीवन में संयम जीवन को दिन प्रतिदिन शतगुणित करें। मुनिश्री धर्मरुचिजी ने सभी नव दीक्षित साधु साध्वियों को संयम के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा देते हुए उनके प्रति आध्यात्मिक मंगल कामना की। नवदीक्षित साधु साध्वियों ने बड़ी दीक्षा के अवसर पर अपनी भाव अभिव्यक्ति दी। अभातेयुप अध्यक्ष विमल जी कटारिया ने कृतज्ञता में विचार व्यक्त किए।

28-Oct-2019 10:17

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