15-Apr-2020 01:43

सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ थे महायोगी कृष्ण

जब वे बच्चे थे, तभी गोकुल छोड़कर मथुरा आ गए, गोकुल से मथुरा की दूरी कुछ मीलों की है किन्तु वह कभी वापस नहीं लौटे।

उनका मथुरा आगमन था कि भारतीय राजनीति में भूचाल आ गया, अजेय समझें जाने वाले प्रजा पीड़क मथुरा नरेश का वध हो गया और सत्ता फिर वृद्ध राजा उग्रसेन के हाथ में वापस आ गयी। शीघ्र ही रक्तमय क्रांति से गुजरे मथुरा राज्य पर तत्कालीन भारत का सबसे शक्तिशाली राजा जिसने सम्राट उपाधि को प्रारम्भ किया था एक के बाद एक कई आक्रमण करता है और पराजित होता है। असफल मगध सम्राट म्लेक्ष यवनराज को जो अपनी अति मानवीय सामर्थ्य के कारण अजेय था, भारत भूमि को आक्रांत करने के लिए आमंत्रित करता है, किन्तु अपने कारागृह में राजाओं की भीड़ रखने वाले उस सम्राट को पता नहीं था कि उसके जैसे दुष्ट राजपुरुषों को प्रत्युत्तर देने वाली राजनीति के पिता का जन्म हो चुका है, युद्ध में से भागने जैसे अपमान जनक कार्य को स्वीकार किया गया किन्तु भारत पर यवनों का पैर नहीं जमने दिया गया, कालयमन को उसी प्रकार मार डाला गया गया जैसे वो मारा जा सकता था।

तत्कालीन राजतंत्रीय युग में द्वारिका गणराज्य की स्थापना भी अभूतपूर्व घटना थी, द्वारिका गणराज्य की सामर्थ्य का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसका प्रतिनिधि राजा न होते हुए भी विश्व के समस्त राजाओं महाराजाओं के मध्य अग्रपूजा के लिए चुना जाता है, यही नहीं वह उसी राजसभा में चेदिनरेश का वध भी कर देता है किन्तु विरोध की कोई ध्वनि नहीं सुनाई पड़ती है। 100 राजाओं की बलि को संकल्पित, सामरिक रूप से अजेय मगधराज को द्वंद्व युद्ध में मार डाला जाता है, सारा राज समाज इस कूटनीति को देखकर दांतों तले उंगली दबा लेता है ।

द्वारिका गणराज्य की सैन्य शक्ति तत्कालीन भारत में सर्वश्रेष्ठ थी किन्तु उस सैन्य शक्ति को चुनने के कारण हस्तिनापुर का अवैध युवराज अपने मामा से फटकार खाता है क्योंकि द्वारिका गणराज्य के प्रमुख की कूटनीतिक क्षमता उस नारायणी सेना से अधिक शक्तिवान थी। भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि आदरणीय एवं अजेय महापुरुष भी जब अधर्म के पक्ष में खड़े हुए तो उनके प्रति आदर भाव रखते हुए भी साधनों की उचितता अनुचितता का विचार किये बिना उनका वध करा दिया गया, तत्कालीन राजाओं में प्रचलित हो रहे पुत्री-कूटनीति का निष्पक्ष विरोध किया, एक तरफ रुक्मिणी का शिशुपाल से बलात् विवाह रोका दूसरी ओर स्वयं अपनी बहन को उसके चुने वर के साथ जाने की व्यवस्था की और उसे ज्येष्ठ भ्राता के दुराग्रह का शिकार होने से बचाया।

असुरों द्वारा अपहृत सहस्त्रों स्त्रियों को मुक्त कराने के बाद उनके योगक्षेम का दायित्व स्वयं लिया, वो दूरदर्शी थे उन्हें पता था कि इनके गर्भ से उत्पन्न संतति असुर कही जायेगी जो कालान्तर आर्यों की शत्रु सिद्ध होगी अतः स्वयं को उनका पति कहलाना स्वीकार किया। राज कारण में इतने व्यस्त थे फिर भी योग की चरम अवस्था को प्राप्त कर चुके थे भूख, प्यास, निद्रा, थकान आदि शारीरिक विकारों को जीत चूके थे, चिरयुवा थे इस सब के बावजूद हास्य परिहास में उसकी कोई तुलना नहीं थी, राजाओं एवं सेनापतियों को भी वैसे ही चिढ़ा देते थे, जैसे नंद ग्राम की काकियों को। हे भारत! उस महान योगी राजनीतिज्ञ को स्मरण करो!!!

15-Apr-2020 01:43

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