12-Nov-2019 05:28

यहाँ से हुई थी थिएटर की शुरुआत ..............

देसी और विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने के लिए पर्यटन विभाग जोरदार मार्केटिंग भी कर रहा है

बिहार का ऐतिहासिक सोनपुर मेला आज भी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कहने को तो यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है लेकिन यहां आने वाले सैलानियों का आकर्षण नौटकी कंपनियों की बालाएं भी होती हैं। आने वाले इन बालाओं के मनमोहक नृत्य एवं शोख अदाओं के आज भी मुरीद हैं। वैसे इस मेले में थियेटर का आना कोई नई बात नहीं है। प्राचीन काल से लगने वाले इस मेले में थियेटर का भी अपना इतिहास रहा है। हरिहर क्षेत्र के लोगों का मानना है कि मेले में थियेटर की परंपरा प्रारंभ से है। इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे।

जानकार बताते हैं कि वर्ष 1909-10 के पूर्व पारसी थियेटर ददा भाई ढ़ूढी की कंपनी आया करती थी। इस कंपनी में सोहराब, दोहराब जी, हकसार खां जैसे कलाकार थे। इसके बाद कोई नामी-गिरामी कंपनी इस मेले में तो नहीं आई, लेकिन मेले में नौटंकी बराबर होती रही। वर्ष 1934-35 में मोहन खां की तीन नौटंकी कंपनी मेले की रौनक हो चली थी। इस कंपनी में गुलाब बाई और कृष्णा बाई जैसी मंजी हुईं कलाकार होती थीं, जिन्हें देखने के लिए पूरे राज्यभर से लोग आते थे।

उस दौरान यह मेला ठुमरी अैर दादरा के बोल से गुलजार रहता था। यही कारण है कि नौटंकी की परंपरा अब इस मेले की पहचान बन गई है। लोग बताते हैं कि मेले में आज भी संगीत और नृत्य का कार्यक्रम होता है। आमतौर पर यहां पांच से छह थियेटर कंपनियां आती हैं। प्रत्येक कंपनियों में 50 से 60 युवतियों का दल दर्शकों का मनोरंजन करता है। स्थानीय पत्रकार विकास आनंद ने कहा, "थियेटर में अब पहली वाली बात नहीं रही। मेला लगाने की यह परंपरा पुरानी है, जिसका निर्वहन किया जा रहा है। आधुनिकता के इस दौर में न तो पहले की तरह गायन मंडलियां हैं और न ही वैसे वादक हैं। नौटंकी की सुसंस्कृत परंपरा भी समाप्त हो गई है।"

वैसे एशिया के इस सबसे बड़े पशु मेले की प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिशें बिहार पर्यटन विभाग द्वारा लगातार की जा रही है। मेले में गीत और संगीत कार्यक्रम की परंपरा बनाए रखने के लिए पर्यटन और जनसंर्पक विभाग मेला के मुख्य पंडालों में प्रत्येक शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करा रहा है। जिसमें प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर के कलाकार प्रस्तुति दे रहे हैं। मेले में आने वालों को आशा है कि इस मेले में फिर से ठुमरी, दादरा और कथक के बोल गूंजेंगे और घुंघुरुओं की झंकार इसके गौरवशाली इतिहास और परंपराओं को जिंदा रखेगी। बहरहाल, यह तो साफ है कि गौरवशाली इतिहास एवं धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक यह विश्वप्रसिद्घ हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेला लोगों का उत्साह और उमंग आज भी बनाए हुए है। देसी और विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने के लिए पर्यटन विभाग जोरदार मार्केटिंग भी कर रहा है।

12-Nov-2019 05:28

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