28-Mar-2020 06:50

अगली पीढ़ी की जगह अपनी चिंता करों, घर में बैठकर चिंतन करो : मनीष कुमार (संपादक)

वक्त आ गया है कि अपनी आंखों से अपनी मौत का तांडव देख रहे हैं, वक्त यहीं हैं महत्त्वकांक्षा छोड़ जीवन बचाव।

जीवन का अंत सामने देखकर अगर आज हम यह नहीं समझ पाएंगे कि वातावरण से खिलवाड़ करने का परिणाम क्या हो सकता हैं ? तो आप जान लिजिए कि आप अगली पीढ़ी को छोड़िए, अभी वर्तमान अपनी जीवन लीला समाप्त होते देखते हुए ही अपनी अंत बहुत जल्दी नज़र आने लगेगा। पिछले कुछ सालों में जिस तरीके से भारत में ही नहीं पुरी दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों से खिलवाड़ के बाद प्राकृतिक आपदाओं ने ना जाने कितनी चुनौतियों को सामने लाकर खड़ा कर दिया। सारी दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों के दुरूपयोग से बड़े बड़े घटनाएं यह साफ साबित करती हैं कि वक्त रहते संभव जाए।

अपराध कौन कर रहा है यह अब समझते हुए हमें एक लोकतांत्रिक व्यवस्था को दुरूस्त करने वाली व्यवस्था की नींव रखनी होगी। आम जनता को एक मत का अधिकार देकर, जनता की भूमिका 5 सालों तक मुंक दर्शक बनाकर रख दिया गया है। विकास के कौन से पैमाने पर लगातार भारत में राजनीति की जाती है उसका परिणाम आज नज़र आने लगी। हर कोई अपनी अपनी जाति, धर्म और समुदाय की घुट्टी पिलाई कि अब लोकतांत्रिक व्यवस्था अंतिम सांसें ले रही हैं।

कुछ उदाहरण से समझने की जरूरत है कि 2019 में बिहार नंबर एक पर रहा है जब प्राकृतिक आपदाओं पर भारतीय संविधान के अनुसार धारा 144 लगाकर जनमानस को घरों में कैद किया गया था। यह प्राकृतिक संसाधनों पर हुए हमलों का जवाब या आपातकाल का दूसरा नाम कह सकते हैं। 2019 में जब वातावरण गर्मी से तपने लगी तो कई जिलाधिकारी ने प्रकृति को सुधारने के लिए कदम की जगह आम लोगों को घरों में कैद करने का फैसला किया। वहीं महज 7-8 महिने बाद आज फिर हम एक प्राकृतिक संसाधनों से खेलने का परिणाम झेल रहे हैं। यह संकट की घड़ी पूरे विश्व पर छाया हुआ है।

प्राकृतिक संसाधनों के साथ खिलवाड़ और उसका सदुपयोग करने वाली व्यवस्था लागू करने की जरूरत है। आज विश्व एक वायरस से एकजुट होकर सामाना करने का प्रयास कर रहा है। उसी तरह एक साथ आकर वातावरण संरक्षण की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है। परमाणु ऊर्जा हो या अन्य प्रकार की रासायनिक हथियारों से एक साथ अलग होना चाहिए। तब जाकर विश्व में शांति और सौहार्द्र का माहौल बनेगा।

28-Mar-2020 06:50

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