22-Nov-2019 04:13

अगर ये नया भारत है। सत्ता हमें हमारा पुराना भारत ही चाहिए। उसे लौटा दो।

राम भक्त रहमान, सिर्फ मुस्लिम होने के कारण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में नियुक्त प्रोफेसर फिरोज खान के विरोध के मुद्दे के बीच हम आपको बताने जा रहे हैं

फ़िरोज़ ख़ान का नाम मेरे ज़हन में हैं और मैं बनारस और बिस्मिल्ला ख़ान के बारे में सोच रहा हूँ। माँ अन्नपूर्णा के मंदिर में बैठा बिस्मिल्ला खान नाम का एक बच्चा शहनाई बजाते हुए बच्चे बूढ़ा हो गया। बनारस छोड़ का कहीं नहीं गया,कहता था दुनिया में हर जगह रस बनाना पड़ना है बनारस में बना बनाया है। गंगा के पानी में बाबा विश्वनाथ की शक़्कर। दूसरी तस्वीर सुदूर दक्षिण में कलाम नाम के लड़के की है जो देवी के मंदिर के प्रसाद से पेट भरता था। और जब गरीबी की लक्ष्मणरेखा लांघ कर मिसाइल मैन होता हुआ देश का प्रथम नागरिक राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम बना तो अपने शपथ ग्रहण समारोह में उसने उस मंदिर के पुजारी को भी बुलाया और आशीष लिया। मुझे पता नहीं वो वैज्ञानिक दिमाग कितना धार्मिक था पर वो साधुओं सन्तों का आशीर्वाद लेता रहा। भाग्य और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए नहीं। समावेशी चेतना के विस्तार के लिए। साझा भारत के निर्माण के लिए। गंगा जमुनी तहज़ीब के सम्मान के लिए। मैं ये लिख ही रहा हूँ कि तीसरा नाम राही मासूम रज़ा का कौंध रहा है। बिहार के राजधानी पटना के एक ऐसी शख्सियत की कहानी जो वेद और पुराण का ज्ञाता है जन्म से मुस्लिम किंतु कर्म से राम भक्त रहमान की कहानी आपको भी भारतीय संस्कृति पर गर्व करने का अनुभव कराएगी. ऐसा नहीं कि फिरोज खान की तरह डॉक्टर एम रहमान कट्टर पंथियों के निशाने पर नहीं आए किंतु इन्होंने अपने आत्मबल के सहारे ना सिर्फ बाधा पर विजय पाई है बल्कि हजारों छात्रों को सरकारी नौकरियों का अवसर मुहैया कराया है. दिधिचि देह दान समिति से जुड़े डॉ रहमान ने अपना संपूर्ण शरीर ही दान कर रखा है 45 साल के रहमान 45 बार से ज्यादा रक्तदान भी कर चुके है। छात्रों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाने वाले गुरु रहमान की अनूठी कहानी जरूर आपको प्रेरणा देगी.धार्मिक एकता की अनूठी मिसाल भी है पटना वाले गुरु डॉक्टर एम रहमान, महज ₹11 की गुरु दक्षिणा में हजारों छात्रों को विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफलता दिला चुके पटना के नया टोला गोपाल मार्केट में अदम्या अदिति गुरुकुल चलाने वाले गुरु डॉक्टर एम रहमान धार्मिक एकता की अनूठी मिसाल भी है.डॉक्टर एम रहमान ने कहा कि भारत की आत्मा भारत के संविधान में बसती है हम लोग गंगा जमुना तहजीब के लोग हैं हमने कभी भी देश से इतर कुछ नहीं सोचा है.

राही मासूम रज़ा, आधा गाँव वाले रही मासूम रज़ा, गाज़ीपुर के गंगा किनारे वाले राही मासूम रज़ा। जो कहते थे "मेरा नाम मुसलमानों जैसा है, मेरी नसों पवित्र गंगा का पानी बहता है। वो आतताइयों को ललकारते हुए कहते हैं कि उन्हें मार के उनके रक्त से महादेव को स्नान कराएं, उनके लहू में बहती गंगा गढ़ा गईं हैं। ये वही राही मासूम रजा हैं जिन्होंने वेदव्यास के बाद वो महाभारत लिखी, जो टेलीविजन के पर्दे से होते हुए हमारे आपके दिल में उतर गई। कितने नाम लिखूँ, रहीम, रसखान, नज़ीर अकबराबादी, बुल्लेशाह, अमीर खुशरो, निजामुद्दीन औलिया, आलम शेख, लखनऊ के आख़री नवाब वाज़िद अली शाह, मुसाहिब लखनवी, उमर अली, नसीर मामूद, सालबेग़, हरिदास ख़ान, औरंगजेब की बेटी जेबुन्निसा और भतीजी ताज़ बेगम, ताज़ ख़ान ऐसे ही सैकड़ों नाम लिखे जा सकते हैं।

तभी तो आधुनिक हिंदी के पितामह भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने कहा था " इन मुसलमान हरि भक्तन पर कोटि हिन्दू वारिये" किवदंतियों, कहानियों की भरमार है। हर पर एक अलग पोस्ट लिखी जा सकती है। कुछ किस्से एक एक पंक्तियों में कहता हूँ ताकि कुछ तस्वीर बन सके। एक बार कृष्ण जी सूफी संत निज़ामुद्दीन औलिया के सपने में आए तो औलिया ने अपने प्रिय शिष्य अमीर ख़ुशरो को सब किस्सा सुनाया और गीत फूटा, "छाप तिलक सब छीनी मोसे नैना मिलाय के"। राजस्थान के प्रसिद्ध मदनमोहन मंदिर में जब एक मुसलमान भक्त ताज़ खान को मंदिर में कृष्ण जी के दर्शन से रोक गया और उसने इससे आहत हो कर खाना पीना छोड़ दिया तो जनश्रुति है कि कृष्ण स्वयं ही खाने की थाल लेकर उस भक्त ताज़ खान के यहाँ पहुँच गए और आज भी मंदिर में मदन मोहन की आरती में वो पंक्ति गई जाती है " ताज़ भक्त मुस्लिम पर प्रभु तुम दया करी, भोजन लेकर घर पहुंचे हे दीन दयाल हरि"। उड़ीसा के पुरी में जग्गननाथ जी की प्रसिद्ध यात्रा का रथ रास्ते में सालबेग़ नाम के एक मुस्लिम संत की मजार पर रुकता है। भगवान अपने उस भक्त को मरने के बाद भी दर्शन देने को रुकते हैं। किवदंती है कि सालबेग़ सैनिक था और किसी जंग में उसके माथे पर एक गहरा घाव हो गया था। जो किसी भी वैध हकीम से नहीं सही हुआ तो उसकी माँ की सलाह पर उसने जगन्नाथ बाबा की भक्ति शुरू की और जगन्नाथ बाबा स्वयं भभूत लेकर आये और उसके माथे पर मली और ज़ख़्म सही हो गया उसके बाद वो कृष्ण भक्त हो गया। और भक्ति गीत लिखने गाने लगा।

ऐसी कहानियों, सच्चाइयों, फ़सानों, जनश्रुतियों और लोककथाओं की भरमार है। एक अविरल धारा है साझा परंपरा और गंगा जमुनी तहज़ीब की। पर आँख के अंधों और मज़हब के मारों को कुछ नहीं दिखता। और ना दिखेगा। पर आज हम जहां खड़े हैं वहां हमारे हाँथ में क्या है? हमारे दिलों में क्या है ? नफ़रतों की कहानियाँ, ज़हर बुझी हक़ीक़तें। अभी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में फ़िरोज़ खान की नियुक्ति को लेकर धर्मांध लोगों ने मोर्चा खोल रखा है। उपद्रव और उन्माद फैलाने में जुटे हैं। उनका विरोध है कि एक मुसलमान संस्कृत नहीं पढ़ा सकता। प्रथम तो ज्ञान पर किसी जाति, किसी धर्म का एकाधिकार नहीं है और धर्म और जाति के नाम पर विद्या के अध्ययन अध्यापन में कोई बाधा किसी लोकतांत्रिक सिस्टम में लगाने का कोई तुक ही नहीं है। दूसरा जब स्वयं भगवान ने कोई भेद नहीं किया। जिन्होंने भक्ति से पुकार निहारा उसे गले से लगाया तो ये कौन होते हैं। और तीसरा फ़िरोज़ खान गंगा जमुनी तहज़ीब, साझा संस्कृति की पुरानी और लंबी विरासत के वाहक हैं उन्हें रोकने का मतलब भारत की नैसर्गिक साझा संस्कृति के प्रवाह को रोकना है। ये जो आदमी आपको इस तस्वीर में दिख रहे हैं ये फ़िरोज़ खान के पिता हैं। रमज़ान खान। कृष्ण भक्त है। मंदिरों में भजन गाते हैं। संस्कृत से स्नातक हैं। इनके पिता भी कृष्ण भक्त थे। आरती और भजन गाते थे। ये इस परिवार की सांस्कृतिक विरासत रही है। ये इस परिवार की जड़ रही है। जो भारत की उद्दात साझा सांस्कृतिक ज़मीन से खाद पानी लेकर फ़िरोज़ खान जैसे फलदार वृक्ष को रक्षित-संरक्षित करके भारत देश को दे सकी। ताकि एक और उदाहरण,एक और नज़ीर बनाई बताई जा सके।

22-Nov-2019 04:13

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