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17-Apr-2018 07:03

अरेरे ,फिर वही बलात्कार - रेप की खबर? इसमें नया क्या है?

(मेरे अपने विचार ).....मेरे इस लेख पर आपकी प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है ! मनीष तिवारी

लेख की शुरुवात कविता की इन पंक्तियों से करता हूँ कभी इस सोच की नदी में भी मन लगाता है डुबकी कि क्या पता मेरा बलात्कार और भी पहले से हो रहा हो मुझे बताये बिना ही हो रहा हो, पड़ोसियों के सपनों में.. सपनों में मेरे पुरुष साथियों के उन राहगीरों की फंताशी दुनिया में जो रास्ते भर बिना झिझके घूरते हैं मेरे कटाव, मेरे उभार या क्या पता मेरे ही रिश्तेदारों के सपनों में भी ! लोग कहते है की " बलात्कार - रेप क्यूँ होते हैं ...?? मेरी नजर में इस सवाल का जवाब कुछ इस प्रकार है :- एक 6 साल के बच्चे ने पहली बार थियेटर में राजा हरिश्चंद्र नामक नाटक देखा और उस नाटक का उस बच्चे के कोमल मन पर ऐसा प्रभाव पड़ा की उसने कसम खा ली की मैं कभी झूठ नहीं बोलूंगा .और यही लड़का आगे चलकर महात्मा गांधी के नाम से विख्यात हुआ.! आज के दौर में 6 साल की उम्र से ही मासूम बच्चे टीवी में फूहड़ता/अश्लीलता /नंगापन देखते है,क्यूँ ..क्यूंकि उसके पापा भी देखते है ,और यही सब देखते -देखते आजकल का बच्चा बड़ा होता है ! उसपर भी टेक्नोलॉजी के इस युग में बच्चा बड़ा होते होते हज़ारो रेप और सेक्स के सीन फ़िल्म - टीवी - इंटरनेट के माध्यम से जाने अनजाने देख चुका होता है ! और त्रासदी देखिये इन सबको आज का "तथाकथित सुधरा समाज " गलत भी नहीं मानता , अब ऐसे माहौल में जो बच्चे बड़े होंगे वो ... महापुरुष - साधू -संत - या ..गांधी -भगत सिंह तो नहीं ही बनेंगे ...मेरी बात पढ़नेवालों को कड़वी ज़रूर लगेगी ..परन्तु सच यही है ! मत भूलिये की बड़ा होकर बच्चा क्या बनेगा कैसे बनेगा इसके लिये "परवरिश और आसपास का माहौल" भी काफी हद तक जिम्मेदार है ! "बलात्कार- रेप "यह लफ्ज़ कितना असर करता है हम पर? क्या झनझना देता है हमारे मानस के तंतुओं को या हम ऐसी खबरों को देख-सुन कर निरपेक्ष भाव से आगे बढ़ जाते हैं?अगर हम संवेदनशील हैं तो ही खबर हमें स्पर्श करती है अन्यथा आमतौर पर यही प्रतिक्रिया होती है कि उफ्फ्फ --अरेरे , फिर वही बलात्कार -रेप की खबर? इसमें नया क्या है? अगर तरीका नया है तो खबर हमारे काम की, वरना एक स्त्री का लूटा जाना हमारे मन की धरा पर कुछ खास हलचल नहीं मचाता ! रेप करने की पहली वजह तो ये है कि हमारी सोसाइटी कितने ही लोगों के लिए पावर दिखाने का मीडियम बन जाती है. ऐसे लोग अपना हक़ जमाकर अपनी एक आइडेन्टिटी क्रिएट करना चाहते हैं. दूसरा कारण है कि अगर कोई लड़की उन्हें पसंद आ जाती है तो उन्हें लगता है कि वो हर हाल में मिलनी चाहिये , चाहे वो हाँ कहे या ना. तीसरी अहम वजह ये है कि वे अपनी काम उत्तेजना को कंट्रोल नहीं कर पाते. न ही वे इसे कंट्रोल करना चाहते हैं. ऐसे लोगों के लिए रेप बदला लेने का माध्यम भी बन जाता है ! आजकल सोसाइटी में जो नजरिया है औरतों के प्रति, वो यही है कि अगर वो मॉडर्न है तो उसे लोग 'तैयार' मानते हैं. वो उसके साथ कुछ भी करने के लिए सोचते हैं. हमें सिखाया ही नहीं गया कि लड़कियां भी लड़कों जैसी ही होती हैं, उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ सेक्स नहीं करना चाहिये. इसके अलावा जो मीडिया हैं समाज में मेसेज देने वाले, उनमें अगर सेक्सुअल वॉयलेंस दिखाया जाएगा, उनका कोई फेवरिट हीरो लड़की के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती करेगा, तो लोग उसे रोल मॉडल की तरह ही लेते हैं. हम अभी भी मीडिया के तौर पर उतने सेंसिटिव नहीं हुए. म्यूज़िक वीडियो, सॉन्ग या फिल्मों में औरत को 'वस्तु' की तरह पेश किया जाता है ! सबसे महत्वपूर्ण बात जो मै इस लेख द्वारा कहना चाहता हूँ वो ये की हमारे देश में महिलाओं को इन्सान समझने के लिए लोग कितना वक्त लगाएंगे ये तो पता नहीं , लेकिन हम बच्चों को अच्छी परवरिश तो दे ही सकते हैं, ताकि वे महिलाओं को वस्तु न समझें. उन्हें सही समय पर सेक्स एजुकेशन दें, ताकि वो इधर-उधर से गलत चीज़ें न सीखें. सबसे ज़रूरी है कि पेरेंट्स अपने बच्चों को "गुड टच" और "बैड टच " का मतलब समझायें और उन्हें आवाज़ उठाने को प्रेरित करें, चुप रहने को नहीं. ! बलात्कार और रेप जैसी घटनायें आये दिन कहीं ना कहीं घटती है क्यूँ ? ...क्यूंकि हमारी सामाजिक मानसिकता भी स्वार्थी हो रही है। फलस्वरूप किसी भी मामले में हम स्वयं को शामिल नहीं करते और अपराधी में व्यापक सामाजिक स्तर पर डर नहीं बन पाता। पहली बार दामिनी/निर्भया /आसिफा के मामले में सामाजिक रोष प्रकट हुआ, वरना ना तो सोच बदली है और ना समाज बदला है ! अभी भी हालात 70 प्रतिशत तक शर्मनाक हैं ! मेरी बात कुछ लोगों को कड़वी ज़रूर लगेगी ..मगर यही सत्य है !

17-Apr-2018 07:03

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