07-Apr-2018 05:55

आरक्षण की आवश्यकता देश की आम आदमी को है राजनेताओं और ब्यूरोक्रेट्स को नहीं।

आरक्षण का लाभ जातिगय रूप से देना, भारत के लिए अभिशाप है। भारत को भारत बनाये रखने में सबसे बड़ी समस्या जातिगत आरक्षण है।

आरक्षण की सही परिभाषा अब बदलने का समय आ चुका हैं। अभी तक आरक्षण को इस प्रकार से परिभाषित किया जाता रहा है। कि आरक्षण के बारे में जानना अति-आवश्यक है। तभी हम इसकी मूल धारणा को जान पाएंगे। अलग - अलग लोगो में अलग- अलग मत है । कोई कहता है होना चाहिए, तो कोई कहता नहीं होना चाहिए। कोई कहता है यह संविधान की मूल अवधारणा के खिलाफ है। कोई कहता है जो बाबा साहेब लिख कर गए आरक्षण के बारे में उसके खिलाफ है। लेकिन समाज का कुछ तबका हमेशा राजनीति के आर में समाज को तोड़ने का प्रयास करते रहे हैं। आरक्षण को समझने में इस प्रकार से मदद मिल सकती हैं। कि सबसे मूल बात जो है आरक्षण उसके बारे में लोग बात तो करना चाहते है, लेकिन क्या वे इसके व्यापक स्तर को बहस का मुद्दा बनाना चाहते है । शायद नहीं, क्योंकि किसी से भी बहस कर ले उनके आरक्षण का मुख्य मुद्दा हमेशा जातिगत आरक्षण के साथ चिपकी हुई नज़र आती है। जिससे जाति का विकास और विफलता का एक स्वरूप हैं। ऐसा क्यों है? ऐसा इसीलिए है क्योंकि वे आरक्षण की मूल अवधारणा जो बाबा साहेब ने संविधान में रखी थी उससे भली भाँति अवगत ही नहीं है और जब उसी का पालन आज तक नहीं हो पाया जिसकी वजह से आप और हम इस बहस को एक मुद्दे के तौर पर अपने मन मुताबिक उछालते रहते है। सबसे पहले आप आरक्षण के बारे में समझे इतना विरोध होने के बावजूद बाबा साहेब ने यह प्रावधान संविधान में रखा, ऐसा कैसे हो गया। जहाँ संविधान को बनाने के करता - धर्ता आज की तारीख में मनुवादी कहलाने वाले लोग थे। फिर भी इस बात की सार्वभौमिकता कैसे स्थापित हो गयी, कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए। कुछ ना कुछ तो रही होगी। सत्यता इन बातों में तभी इस शब्द का प्रयोग हुआ संविधान में। कोई इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है, लेकिन आरक्षण होना चाहिए या नहीं यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन आमलोगों की राय हमेशा से जातिगत आरक्षण के आस पास सिमट कर रह जाती है। बहुत ही महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दृष्टि से यह जानकारी रखना कि 1932 में जब गोलमेज सम्मलेन में इस बात पर सहमति बनी की आरक्षण होना चाहिए। तो आखिर इसका आधार क्या होना चाहिए। तो वहाँ पर यह तय हुआ की समाज में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से लोग समाज के मुख्य धारा से वंचित रह गए है , उनकी सूची तैयार की जाय और उस सूची के आधार पर समाज में इन लोगो के लिए कुछ प्रावधान रखा जाय। ताकि इनको समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके । जिसे बाद में इसी को आधार बनाकर संविधान में प्रावधान रखा गया और इस सूची को संविधान में नाम दिया गया अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जनजाति बाद में इसी सूची में एक नया सूची शामिल किया गया, जिसको नाम दिया गया:- अत्यंत पिछड़ा वर्ग। हमेशा से आरक्षण को राजनेता ना तो समझे है और ना ही समझने देने का प्रयास ही किया है। आम लोगों को गुमराह करते रहना ताकि वंशानुगत राजनीति बनी रहें। आरक्षण पेट भरने का साधन नहीं, इसका जो मूल अर्थ है वह है प्रतिनिधित्व। आरक्षण के द्वारा ऐसे समाज को प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया गया । जो शुरू से समाज के अंदर दबे कुचले रहे है। इस प्रतिनिधित्वता को नाम दिया गया । राजनितिक आरक्षण जो शुरुआत में संविधान में शामिल किया गया था, पहले 10 सालों के लिए था। लेकिन जो सामाजिक आरक्षण उसकी अवधारणा इसके विपरीत है, उसकी मूल अवधारणा यह थी कि जब तक समाज के उपेक्षित लोग समाज के बांकी लोगो के बराबर खड़े नहीं हो जाते है । तबतक यह लागु रहेगा , क्योंकि सामाजिक आरक्षण का मूल मंत्र यही था की समाज के हरेक वर्ग के लोगो की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर एक नहीं हो जाते है तब तक जारी रहेगी। वहीं आजाद भारत में आरक्षण राजनैतिक महत्वाकांक्षा का अड्डा बन कर रह गई। आज़ादी के 72 सालो बाद भी समाज का एक बड़ा तबका अपनी मुलभुत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। तो उसके सामाजिक न्याय की बात करना बेमानी होगी। भारतीयता और भारत को समझने का प्रयास आज तक किसी राजनीतिक दलों ने प्रयास ही नहीं किया। दिक्कत यह है की लोग एक सन्दर्भ को दूसरे सन्दर्भ के साथ को जोड़ कर देखते है। जबकि एक सन्दर्भ हमेशा दूसरे सन्दर्भ से अलग होता है। लोग सामाजिक आरक्षण को जातिगत आरक्षण का नाम  देकर एक दूसरे को दिग्भ्रमित करने की कोशिश करते है, जबकि जातिगत आरक्षण कोई शब्द ही नही है। तो सवाल उठता है की अगर यह जातिगत आरक्षण नहीं है तो क्या है? यह एक सामाजिक आरक्षण है ना की जातिगत आरक्षण। अब सवाल उठता है तो आखिर दोनों में अंतर क्या है। यह सच है की यह जाती आधारित आरक्षण है। लेकिन संविधान क्या कहता है, इसके बारे में और संविधान सामाजिक आरक्षण कहता है ना की जातिगत आरक्षण। संविधान के अनुसार सामाजिक आरक्षण का मतलब होता है। समाज में सामाजिक एकरूपता, आर्थिक एकरूपता और शैक्षणिक एकरूपता ही इसका आधार है। यही मूलतः संविधान कहता भी है। आरक्षण का आम भारतीय ना तो विरोधी हैं और ना ही उसमें सहयोग देने से पीछे। हम आरक्षण के समर्थक और विरोधी कब है, यह जानना अति आवश्यक है। आरक्षण जातिगत होकर समाज के लिए विकलांगता का काम कर रही है।

07-Apr-2018 05:55

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