04-Dec-2019 09:13

जब 21 सिक्खों ने 12 हजार की सेना को मिट्टी में मिला दिया, वो युद्ध जो शौर्य के लिए लड़ा गया.....

इतिहास 1897 का है जब नार्थ वेस्ट फ्रंटियर स्टेट के गुलिस्तान और लोखार्ट के ककिलों पर कब्जा करने के लिए अफगानों, पश्तूनों ने मिलकर हमला कर दिया

'सवा लाख से एक लड़ाऊँ' ये उद्घोष वाक्य है गुरु गोविंदसिंह जी का. कुछ लोगों को लगता था गुरु गोविंद जी ने बस जोश जगाने के उद्देश्य से ऐसा कहा था मगर नहीं यह सिक्खों की एक ऐसी हकीकत है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण दुनिया ने आज से लगभग 120 साल पहले 11 सितंबर 1897 को देखा. जब 21 सिक्ख सूरमा 12 से 15 हजार की फौज से भिड़ गए. आज का विषय इन्हीं वीरों की गाथा 'सारागढ़ी के युद्ध' पर आधारित है.

हम सिर्फ 21 थे और वो 12 हजार- ये इतिहास 1897 का है जब नार्थ वेस्ट फ्रंटियर स्टेट के गुलिस्तान और लोखार्ट के ककिलों पर कब्जा करने के लिए अफगानों, पश्तूनों ने मिलकर हमला कर दिया. तब के ब्रिटिश शासन को ऐसे औचक हमले की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी और न ही कोई बड़ी सुरक्षा चौकियां वहां स्थापित थीं. महाराज रणजीत सिंह द्वारा निर्मित इन किलों तक पहुंचने के मार्ग में एकमात्र बाधा थे 36 सिक्ख रेजीमेंट के केशधारी सिक्ख योद्धा जो सारागढ़ी चौकी पर तैनात थे. गिनती में केवल 21 इन योद्धाओं को पार कर किला हासिल करना अफगानों को आसान काम लग रहा था मगर जब युद्ध भूमि में 'जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल' के नारे गूंजे तो अफगानों के वजूद हिल गए.

ब्रिटिश शासन के द्वारा तैनात इन जवानों को अन्य मदद मिलना लगभग नामुमकिन था तो तय किया गया युद्ध ही करेंगे. लांस नायक लाभ सिंह और भगवान सिंह ने गोलियां चलानी शुरू कीं और रण शुरू हुआ. युद्ध न तो बंदूक से लडा जाता है न तलवार से वास्तविक युद्ध तो योद्धा के जिगर का परिचय होता है. 21 सिक्खों के पराक्रम को देख अफगान दहल गए और उनके पैर उखड़ने लगे. जो कभी सोचा न गया, जो सिर्फ कथाओं में कहा गया वो हकीकत में हो रहा था. सैकड़ों अफगानों को मौत की नींद सुला सभी सिक्खों ने प्राण त्याग दिए मगर एक भी अफगान किलों के अंदर नहीं घुस पाया. उनकी मौत के बाद ब्रिटिश सेना की अन्य टुकड़ियां भी वहां पहुंच गईं और अफगान आक्रमण को विफल कर दिया.

सारागढ़ी में लड़े गए इस युद्ध के योद्धाओं की चर्चा जब दुनिया में फैली तो सब अचरज में थे उनके सामर्थ्य को सुनकर. इस युद्ध को इतिहास के महानतम युद्धों में जगह मिली और सभी शूरवीरों को मरणोपरांत परमवीर चक्र के तुल्य विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया. ब्रिटिश शासन ने उन सभी वीरों का समक्ष खुद को नतमस्तक किया और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की. वास्तव में महान थे वो योद्धा जिन्होंने सारागढ़ी में अफगानों को मिट्टी में मिला दिया ॥

04-Dec-2019 09:13

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