25-Mar-2020 09:42

दंगे ने समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र और अपराधशास्त्र को समृद्ध किया

दंगों का भी गौरवपूर्ण इतिहास रहा है, दंगे ने समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र और अपराधशास्त्र को समृद्ध किया है। यदि सरकार दंगे को रोक देगी तो अपराधशास्त्र की उन्नति कैसे होगी

दंगाई देश के सम्मानित नागरिक होते हैं, वे भी देश का नमक खाते हैं, उनका भी घर है, परिवार है, समाज है। दंगाइयों की भी निजता होती है, उनका भी अपना निजी जीवन होता है, उनके पोस्टर सार्वजनिक स्थलों पर लगाकर उनकी निजता पर उत्तर प्रदेश की सरकार ने हमला किया है। सरकार जवाब दे कि उसने इन दंगाइयों की निजता पर हमला क्यों किया? माना कि दंगाइयों ने कुछ बसों में आग लगाई, कुछ वाहनों में तोड़फोड़ की, कुछ सरकारी भवनों को नुकसान पहुँचाया। इस दंगे में दस-बीस लोग मारे गए, कुछ महिलाएं विधवा हुईं, कुछ माताएं निपूती हुईं लेकिन इससे सरकार को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह दंगाइयों के पोस्टर लगाकर उनकी इज्जत को नीलाम करे...।

अरे भाई! दंगे तो होते ही रहते हैं और आगे भी होते रहेंगे। इसे कोई भी सरकारें नहीं रोक सकती हैं। सरकार का काम दंगा रोकना नहीं है बल्कि दंगे के बाद आँसू बहाना, मुआवजा बाँटना और कठोर शब्दों में निंदा करना है...। दंगों का भी गौरवपूर्ण इतिहास रहा है, दंगे ने समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र और अपराधशास्त्र को समृद्ध किया है। यदि सरकार दंगे को रोक देगी तो अपराधशास्त्र की उन्नति कैसे होगी, उसमें नए-नए पाठ्यक्रम कैसे जुड़ेंगे और अनुसंधानकर्ताओं को अनुसंधान हेतु नए विषय कैसे मिलेंगे। सरकार को यह देखना चाहिए कि दंगे से कितने लाभ प्राप्त होते है। दंगे के बाद ही तो “जब बड़े पेड़ गिरते हैं तो धरती हिलती है” जैसे ऐतिहासिक वाक्य का अविष्कार हुआ था। दंगे होना महत्वपूर्ण नहीं है, दंगे के बाद सार्वजनिक निंदा करना, भाईचारे की कमीज बाँटना और गंगा-जमुनी तहजीब की चटनी परोसना महत्वपूर्ण है। दंगाइयों को अपनी निजता की रक्षा करने का पूरा अधिकार है, सरकार उनके पोस्टर लगाकर उनके निजी जीवन में दखल नहीं दे सकती है।

सरकार को दंगाइयों के विरुद्ध कार्रवाई करने का अधिकार किसने दे दिया? यह अधिकार सिर्फ अवार्ड वापसी गिरोह को है कि वह दंगाई को सजा देने की वकालत करे या उसे भारत रत्न देने कि मांग। ये लोग कभी सहन नहीं करेंगे कि कोई भी सरकार दंगाइयों की साख को मिट्टी में मिलाने का प्रयास करे। दंगा देश और समाज के लिए बहुत जरुरी है। दंगे से पुलिस को सतर्क-सावधान रहने और खुद को चाक-चौबंद की प्रेरणा मिलती है। दंगे के कारण पुलिस और प्रशासन को भीड़ के मनोविज्ञान को समझने और भीड़ की चुनौतियों से जूझने का कौशल प्राप्त होता है। दंगे के कारण नेताओं को अपनी राजनीति को धार देने, राजनैतिक गोटियाँ बिठाने और सहानुभूति का महाप्रसाद बाँटने का सुयोग मिलता है। दंगों के कारण लेखकों-कवियों को पुस्तकें, कहानियाँ, कविताएँ और उपन्यास लिखने के लिए कच्चे माल मिलते हैं और मीडिया को विभिन्न पार्टियों के प्रवक्ताओं से बहस कराकर टीआरपी...। क्या सरकार साहित्य का विकास अवरुद्ध कर देना चाहती है ? दंगा जरुरी है, यह होते रहना चाहिए। दंगे से समाज में विभाजन होता है, लोग जातियों-उपजातियों, वर्गों-उपवर्गों में बँटते हैं और समाजशास्त्रियों एवं विभिन्न विषयों के शोधार्थी को नए क्षेत्र के अध्ययन-अनुसंधान का अवसर मिलता है।

दंगे से परिवारवादी, समधियानावादी और बहिनजनवादी नेताओं के लिए वोटों की खेती करना आसान व सुविधाजनक हो जाता है। सरकार ने दंगाई वीर बहादुरों के पोस्टर लगाकर अच्छा नहीं किया। पोस्टर लगाने के बाद भला समाज में इनकी क्या इज्जत रह जाएगी। इस पोस्टरबाजी से तो दंगा प्रेमी बंधु-बांधव हताश और निराश हो जाएँगे और दंगे रुक जाएँगे, जिसके कारण पुलिस बल बेकार हो जाएँगी, दंगा रोधी दस्ते सुस्त पड़ जाएँगे, आंशु गैस के गोले खराब हो जाएंगे। दंगे के कारण नए-नए बटालियन का गठन होता है जिसमें हजारों युवकों को नौकरी मिलती है। यदि दंगे रुक जाएँगे तो बेरोजगारी बढ़ जाएगी। बेरोजगारी के कारण लोग आत्महत्या करेंगे और समाज में बिखराव होने लगेगा। सरकार क्यों बेरोजगारी बढ़ाना और समाज को बांटना चाहती है। दंगे से हमारा शब्दकोश कितना समृद्ध हुआ है, सरकार को इसका भान नहीं है। दंगाई, दंगारोधी, दंगाबाज, दंगाकारी, दंगैत, दंगा-फ़साद जैसे नए-नए शब्दों से शब्दकोशों का गौरव बढ़ता है। हम चीनी मानसिकता वाले वामपंथी धनपशु, बिकाऊ चैनल, बौद्धिक आतंकवाद, अवार्ड वापसी गैंग, अर्बन जेहादी और सेलेक्टिव पत्रकारिता जैसे जुड़वाँ शब्दों को भी शब्दकोशों में स्थान दिलाने का प्रयास कर रहे हैं। आशा है, शीघ्र ये पवित्र शब्द शब्दकोशों मे मिलेंगे। अतः दंगे जरूरी है...।

25-Mar-2020 09:42

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