24-Dec-2018 10:50

पं. राजकुमार शुक्ल जी को सम्मान दिलाने में सफ़लता से सवर्णों की पहली जीत : ई. रविन्द्र कुमार सिंह

02 अक्टूबर 2018 से राष्ट्रीय समान अधिकार यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि रही हैं, आजादी के नेतृत्वकर्त्ता को सम्मान दिलाने की।

राष्ट्रीय समान अधिकार यात्रा के क्रम में जब पं. राजकुमार शुक्ल जी के पैतृक घर पर पहुंचे तो दशा और दिशा देखकर देश की मानसिक स्वास्थ्य का अंदाजा लग गया था। जिस पं. राजकुमार शुक्ल जी ने आधुनिक भारत की आजादी की नींव रखने का काम किया, उनकी उपेक्षा देखकर रूह कांप गई। यह कहते हुये राष्ट्रीय समान अधिकार यात्रा के राष्ट्रीय संयोजक ई. रविन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि पं. शुक्ल जी के नातीयों द्वारा हमें बहुत ही मार्मिक बातें बताई। उन्होंने बताया कि आज चंपारण आंदोलन का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। हमें भी और खुशी तब हुई जब नानाजी पं. राजकुमार शुक्ल जी के नाम पर डाक टिकट जारी करने की बात कहीं गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोकर्पण होने वाले डाक टिकट को राजनीतिक दलों के साजिश का शिकार होना पड़ा। दुखद् और रहा कि साजिश रचने वाले सत्ताधारी पार्टी के ही सांसद और मंत्री रहे हैं।

ई. रविन्द्र कुमार सिंह बताते हैं कि जब हमारी यात्रा पं. राजकुमार शुक्ल जी के दरवाजे पर पहुँची तो घर पर जाते ही सांसों को भी जान मिला। आज आप सबों को जानकर आश्चर्य होगा कि आजादी का रास्ता साफ करने वाले के घर पर जाने का एकमात्र पगडण्डी रास्ता है। वह भी रास्ते ऐसे हैं कि आप अपनी इच्छा शक्ति के अनुसार ही उनके घर तक पहुँच पायेंगे। बहुत ही आश्चर्य की बातें कि महात्मा गांधी के आंदोलन के नाम पर शताब्दी समारोह में अरबों का खेल खेला गया। लेकिन मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बनाने वाले पं. राजकुमार शुक्ल के योगदान को भुला दिया गया। याद रखने वाली बातें यह है कि पं. राजकुमार शुक्ल की राजनैतिक राष्ट्रवादी स्वतंत्रता की सोच़ ने ही महात्मा गांधी को जीवंत किया। पं. शुक्ल का कद मोहनदास करमचंद गांधी से कहीं बड़ा हैं और उनके योगदान को भारतवर्ष भूले तो दुर्भाग्य है।

आगे ई. रविन्द्र कुमार सिंह कहते है कि जब देश के प्रधानमंत्री रोज रोज नये सगुफे फेंकते हैं। इतिहास का चरित्र चित्रण करते रहते हैं और इतिहास को तोड़ने में गुरेज नहीं करते हैं, उस समय भी राजनीतिक दलाली का हिस्सा पं. राजकुमार शुक्ल जी को नहीं बनाना चाहिए था। नरेंद्र मोदी ने जो ऐतिहासिक राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त किया वह भारत के लिए शुभ संकेत नहीं रहा हैं। चंपारण में आयोजित कार्यक्रम में पं. राजकुमार शुक्ल को भुला देना बिहार ही नहीं पूरे लोकतांत्रिक राष्ट्र के मुँह पर तमाचा था। सोते उठते सवाल पुछने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद से कभी सवाल नहीं किया। आज भी नरेन्द्र मोदी पं. जवाहर लाल नेहरू के नाम पर ही वोट माँगते नजर आते हैं। राजनीति विरासत को ध्वस्त करने में लगे भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री से पं. राजकुमार शुक्ल जी के साथ यह व्यवहार उचित ही नहीं राष्ट्र द्रोह के समान था। फिर भी पुरा भारत चुप्पी साधे हुए था यह आने वाले समय में देशभक्तों की गरिमा के लिए शुभसंकेत नहीं है। जिन्होंने अपने प्राण देकर भारत को जीवंत रखा उसकों भूलना या जानबूझकर उपेक्षित करना महापाप हैं।

संवाद के अंत में ई. रविन्द्र कुमार सिंह कहते हैं कि भारत में गुरूओं की परम्परा रही हैं। चंद्रगुप्त को खोज कर चाणक्य लाये और भारत को अखंडता की ओर बढ़ाये। उसी तरह महात्मा गांधी को पहचानने वाले राजकुमार शुक्ल ही थे। पं. राजकुमार शुक्ल किताबों व इतिहास के पन्नों की चीज नहीं है। पं. राजकुमार शुक्ल भारत की एक जीवनशैली का प्रति हैं। फिर भी एक बात की खुशी है कि भारत सरकार को अपनी ही राजनीति का शिकार होना पड़ा। जिससे समझते हुए पं. राजकुमार शुक्ल जी पर तैयार पोस्टल डाक टिकट जारी करना पड़ा। यह राष्ट्रीय समान अधिकार यात्रा की पहली जीत हैं। हमारे देश का गौरव अपने पूर्वजों के सम्मान पर ही टीका हैं। हम अपनी परम्परा, संस्कृत व संस्कृति के बाहर जार राष्ट्र निर्माण की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

24-Dec-2018 10:50

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