16-Jun-2018 10:57

बंद करने वाले राजनीति दलों के राष्ट्रीय अध्यक्ष को हो फाँसी

चुनाव आते ही राजनीतिक दलों का नाटक हुआ शुरु, अपराधियों को संरक्षण खुद देते हैं और अपराध पर धरना, प्रदर्शन और बिहार बंद की घोषणाएँ। युवाओं को झोंक रहे हैं अपराधी बनाने की राह में। बिहार और भारत को खिलौना बनाकर रख दिया हैं। जब नींद खुली, तो सोये-सोये बिहार

अब यह नाटक भी बंद हो जाये और युवाओं को राजनीतिक दलों के दल से बचाने का प्रयास हो। जातिये रंग देकर युवाओं को गुमराह किया जाता हैं और युवकों को अपने साथियों के बीच दुश्मनी कराई जाती हैं। आज भारत के बड़े-बड़े राजनीतिक दलों के नेताओं को देखें तो जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद के नाम से आम आदमी को अपराधी बना रहे हैं। जब लगता है इन्हें की उनकी लोकप्रियता दो चार दिनों में कम हुई हैं, तब कुछ ना कुछ ड्रामा क्रियेट कर लेते हैं।

वह कोई नहीं भूला हैं कि पिछले चार-पाँच दशकों में भारत की राजनीति को जातियों में विभाजित कर रख दिया है। जहाँ काँग्रेस और इंदिरा पर आरोप लगाकर जय प्रकाश नारायण ने आंदोलन शुरू किया। काँग्रेस ने कितना अच्छा किया या कितना बुरा वह भारत और भारत की जनता जानती हैं। जिस रफ्तार की जरूरत भारत का विकास होना चाहिए था, शायद वह नहीं हो रहा था। जिसके कारण ही जय प्रकाश नारायण द्वारा आंदोलन शुरु किया गया। लेकिन निस्वार्थ का आंदोलन और वह भी बिना प्लान का। आंदोलन का स्वरूप क्या होगा, कौन नेतृत्वकर्ता होगा, आगे के नेतृत्व का रिजल्ट क्या होगा। इन सभी बातों से भारत का कितना भला होगा, उसका अंदाजा ही नहीं था और ना ही कार्य की कोई प्रणाली।

आंदोलन से जयप्रकाश नारायण को एक सामाजिक न्याय का मूर्ति माना जाने लगा। तो वहीं जो लगातार आगे बढ़ते-बढ़ते नेतृत्व की ऐसी विसाद बना दिया। कि पूरे भारत में और अच्छे के जगह भूखें-नंगों को राजनीति में जगह मिल गई और भारत की राजनीति लूटेरों के हाथ लग गया। आंदोलन का स्वरूप भारत के हर क्षेत्र में जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद इतने बड़े पैमाने पर खड़ा हुआ है कि आज आम आदमी आम नहीं रह गया। शिक्षा के वगैर भारत की राजनीति बन गई हैं, भोजन की जरूरत की इच्छाओं से अलग हो गई है, घर के जगह गरीब भारतीयों को खुली छतें दे दि गई हैं, बिजली की जगह आज भी लालटेन में गाँवों को रखने की तैयारी है, परमाणु युग में तीर की बातें हो रही हैं, आज कचड़े युग में थकेला जा रहा हैं जहाँ कमल की आर में, एअर के युग में साईकिल और हाथी पर चढ़ाने में लगे हैं, घर बनाने के जगह झोपड़ी की बाते हो रही हैं, एअर कंडीशनर युग में पंखे बाँटे जा रहे हैं। हद हो गई हैं कि आज ना जाने कितने सारे लोग पार्टियों ने एक-एक सीट जीत कर भारत को षडयंत्र में घोल रखा हैं।

भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा हैं वहाँ युवकों को अपने आप अपनी जिम्मेदारी उठानी होगी। संसद में बैठे लोगों को अपने दायित्वों का निर्वहन करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसका उदाहरण के रूप में उदाहरण बने हैं कई सांसद हैं। संसद के जगह सड़कों पर जातिवाद को बढ़ावा देने में लगे हैं। अपराधियों द्वारा सदन पर कब्जा किया हुआ हैं। आम आदमी को अपराधी बना रहे हैं और छोटी छोटी बातों के जेल में हैं और उन्हें बेल नहीं मिलती। लेकिन भारत के सदनों में 40% सांसद और विधायक पर अपराधिक मुकदमे दर्ज हैं और सब के सब खुलेयाम घुम रहे हैं। एक बार फिर से राजनेताओं ने आंदोलन करने की घोषणा करने लगे हैं। भारत बंद तो बिहार बंद का ऐसे घोषणाएँ बंद हो नहीं तो भारत की अखंडता खत्म हो रही हैं। आज सारे अपराधियों ने मिलकर आम आदमी को आम युवाओं को अपराधी बना रहे हैं। सदनों की जिम्मेदारी नहीं निभा पा रहे भारत के 543 लोकसभा सांसद, वहीं 245 राज्यसभा सांसद, विधायक 4121 और विधायक परिषद के 476 सदस्य। लंबी-लंबी फेंकने और आम आदमी को गुमराह करने में ही मचा आता है। संविधान ने भारत की पूर्ण विकास का जिम्मेदारी इनके कंधों पर दिया हैं और आम आदमी इन पर भरोसा करता है। लेकिन इनमें से एक नहीं है या तो वह भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री जो यह कह दे कि मैं जिम्मेदार हूँ। भारत के प्रधानमंत्री ही अब झूठ की खेती और युवाओं को अपराधी बनाने में व्यस्त हैं तो चिंता की बात है कि किस पर भरोसा किया जाए। सदनों की स्थिति इतनी खराब हो गई है कि आम आदमी करें तो क्या करें। आम आदमी जिम्मेदारी के साथ संविधान का सम्मान करते हैं और जिनके कंधों पर संविधान की जिम्मेदारी है वो गुमराह औ नये नये हथकंडे अपनाते रहते हैं। समय है कि इन सदन के लोगों को गुमराह करने और आम आदमी को गुमराह करने के लिए फाँसी हो।

16-Jun-2018 10:57

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