03-Aug-2019 12:04

रवीश पत्रकारिता ही नहीं लोकतंत्र की आवाज : अहान न्यूज़

रवीश पत्रकारिता के साथ लोकतंत्र को जीवंत किया, आज उन सभी लोगों के जुबां पर ताले लग गए जो रवीश की जुबा बंद करने का प्रयास करते रहें

आज बहुत ही गौरव का क्षण है, जब दुनिया में एक नाम उनके समकक्ष आकर खड़ा हो गया। जिन्हें आम आदमी की आवाज बनने का गौरव प्राप्त हुआ होगा। पत्रकारिता एक संवाद का ऐसा माध्यम है, जो सत्ताभोगियों के साथ आम आदमी के बीच की कड़ीयों को जोड़ने का काम करता है। जिसका सही उदाहरण रवीश कुमार ने लगातार प्रस्तुत किया। एनडीटीवी के साथ अपने लंबे कैरियर में स्थिरता, संयमता, लक्ष्य की प्राप्ति, अपने काम के प्रति जिम्मेवारी, सबकी सुनना सबकी कहना, किसी ने कर दिखाया। तो वह बिहार का गौरवशाली पुत्र रविश कुमार हुए। रवीश कुमार को मात्र बिहार का कहना अब और बेईमानी हो जाता है। क्योंकि रवीश कुमार अब से भारत के भी नहीं रह गए, अब रवीश कुमार का कद दुनिया के पत्रकारिता जगत के विद्वानों के समकक्ष कदम से कदम मिलाकर चलने वाली हो गई। रवीश कुमार को समझना शायद भक्ति कर रहे, राजनीतिक दलों के तलवे चाटते पत्रकारों के मुंह पर चमाटा भी कम पड़े। यह पत्रकारिता का युग है जब सत्ताभोगी आम आवाज को दबा रहे हो, तब जाकर पत्रकारिता का काम शुरू होता है और यही काम लगभग दो दशकों से रवीश कुमार ने किया।

रवीश की पत्रकारिता शायद आज भी उन भारतीयों को ना समझ में आएगी, जिन्हें सत्ताधारी और सत्ताभोगीओं में फर्क ही नहीं पता। रविश की पत्रकारिता उन्हें कभी समझ में नहीं आएगी, जो कभी आम आदमी की आवाज बनने का प्रयास नहीं किया। रविश की पत्रकारिता उन्हें कभी समझ में नहीं आएगी, जो अपने घर की दहलीज को मांगने से भी डरते हो। रवीश कुमार की पत्रकारिता उन्हें कभी समझ में नहीं आएगी, जो अपने संस्कार और संस्कृति को किसी व्यक्तिवादी विचारधाराओं के अधीन गिरवी रख दिया। रवीश की पत्रकारिता उन्हें बिल्कुल समझ नहीं आएगी, जो अपने जमीन और जमीर दोनों को गिरवी रखने में जरा भी संकोच ना करता हो। रवीश की पत्रकारिता इतनी आसान अगर होती तो उन सभी लोगों को यह बात समझ में आती, जो प्रतिदिन किसी न किसी कारण से भारत सरकार के सिस्टम के कारण परेशान होते हैं। रविश की पत्रकारिता उन्हें तब समझ में आनी चाहिए थी, जब सत्ता हथियाने के लिए किसी पार्टी के द्वारा व्यक्तिवादी विचार को पूरे भारत पर थोपने का प्रयास किया और वह उसमें कामयाब रहा। आखिर हासिल क्या हुआ, उन सभी लोगों को जो भारत को एक सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ते हुए देख रहे थे। रवीश की पत्रकारिता इतनी ही लाचार होती तो, विश्व आज उसकी शब्दों पर सर ना झुकाता। रवीश की पत्रकारिता इतनी कमजोर अगर होती, एशिया का नोबेल पुरस्कार कहे जाने वाला रैमाॅन मैग्ससे पुरस्कार रवीश को ना मिलता। आज कुछ अच्छी बातें तो कर लो, रवीश के लिए पत्रकारिता का एक बड़ा धर्म उसने निभाकर पूरे विश्व में भारत को गौरवान्वित किया है। रवीश की पत्रकारिता ने 12 साल बाद भारत को यह सम्मान दिलाने का काम किया। और यह रवीश की पत्रकारिता का ही दिन है कि आज भारत पत्रकारिता के क्षेत्र में दुनिया के सामने अपना सर उठा कर खड़ा है और गर्व कर रहा है कि हा रवीश हम भारतीय हैं।

रवीश कुमार आज जो मुकाम पाया है, वह मात्र रवीश की उपलब्धि नहीं है और कभी एक व्यक्ति की उपलब्धि इतनी बड़ी नहीं हो सकती। जब कोई उपलब्धि पाता है तो उसके पीछे ना जाने कितने लोगों का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तरीके से सहयोग होता है। ना जाने कितने लोगों का समर्थन होता है। विश्वास होता है, उस व्यक्ति पर जो आगे बढ़कर हमारा नेतृत्व करता है। पत्रकारिता जिस पर पूरा विश्व रैंकिंग में भारत 180 देशों के बाद रहता था। उसके बावजूद रवीश कुमार ने एशिया के सबसे बड़े पुरस्कार को प्राप्त कर भारत का एशिया में पत्रकारिता का अंतिम स्थान होना शायद ना खलेगा। रवीश की पत्रकारिता ने आवाज को बुलंद करने का प्रयास किया। आज रवीश का पत्रकारिता ही है जो रविश ही नहीं आम पत्रकारिता करने वाले जज्बात रखने वाले, हौसला रखने वाले, पत्रकारों के लिए एक गौरवपूर्ण समय है। यह पत्रकारिता का एक ऐसा आयाम है, यहां से भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अखंड विश्वास रखने का एक सुनहरा अवसर आया है। रवीश कुमार ने यह साबित किया, कि भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था को अगर कोई पुनः स्थापित कर सकता है, तो वह लोकतांत्रिक भूमि पर जन्म लिया व्यक्ति एवं व्यक्तित्व का ही हो सकता है। इतना आसान नहीं है जितना राजनीतिक दल एवं राजनीतिक दल के चाटुकार, सत्ताधारी और सत्ता भोगी राजनेताओं के शब्दों में होता है। लोकतंत्र को समझने के लिए लोकतांत्रिक होने की जरूरत है और लोकतांत्रिक होने के लिए आवाज को समझने की जरूरत। आवाज समझने के लिए फिर साबित होता है, वैशाली गणराज्य का होना ही महत्वपूर्ण है।

अंत में इस समाचार को लेकर इतना ही कहूंगा, रवीश कुमार ने भारत की पत्रकारिता को एक बेहतर और सुनहरा भविष्य देने का नींव रख डाला। हमें याद रखना चाहिए, आने वाला समय अपनी आवाज को बुलंद करने के लिए, लोकतांत्रिक तरीके से लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए, आम आदमी को समझने के साथ ही पत्रकारिता करनी पड़ेगी। पत्रकारिता कभी भी सरकार की आवाज नहीं हो सकती। पत्रकारिता हमेशा आम आदमी की आवाज बनकर ही रहा है। पत्रकारिता की उत्पत्ति आम आदमी की आवाज को बुलंद करने के लिए हुई थी। पत्रकारिता की उत्पत्ति ही आम आदमी का संवाद एक दूसरे और दूर-दूर तक रहने वाले लोगों के लिए पहुंचाने का एक माध्यम ही था। हमें यह समझना पड़ेगा कि पत्रकारिता आम भारतीय या कहें किसी भी देश का हो, पत्रकारिता हमेशा जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन, के साथ ही चलेगा। यह कभी नहीं भूलना चाहिए, कि सत्ताधारी या सत्ताभोगी होने से आप जनता की आवाज को दबा देंगे। अगर आप दबाते हैं तो फिर कोई रवीश कुमार आएगा, फिर जनता की आवाज बुलंद कर विश्व पटल पर छाएगा। और जिसका नेतृत्व फिर आप को स्वीकार करना पड़ेगा। आज बहुत सारे लोग खुश हैं, रवीश की कामयाबी से नहीं पत्रकारिता की कामयाबी से। मैं नहीं जानता कितना खुश हैं रवीश, पर कितना वह गर्व महसूस कर रहे हैं। लेकिन मैं इतना जानता हूं कि रवीश कुमार को आज उन सभी लोगों की याद आ रही होगी, जो उनको आज रवीश कुमार बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होगी। रवीश अकेला कभी महत्वपूर्ण नहीं बन सकता, महत्वपूर्ण बनने के लिए आपको सबको एक सूत्र में बांधकर, सब की आवाज बनकर, सबका साथ देकर ही बना जा सकता है। रवीश की आवाज आज भारत की आवाज और भारत की आवाज रवीश की आवाज। पत्रकारिता के लिए और पत्रकारिता को सम्मान दिलाने के लिए रवीश कुमार को पूरे अहान न्यूज़ व वैशाली डायरी परिवार की तरफ से ढेरों शुभकामनाएं एवं बधाई।

03-Aug-2019 12:04

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