10-Apr-2018 05:22

शिक्षा के नाम पर तमाशा बंद कब होगा

भारत के शिक्षा मंत्री तक शिक्षा पर आंदोलन कर रहे हैं। सदन की मर्यादा को चकनाचूर कर रहे हैं। सदन में काम नहीं करने वाले सड़कों पर शिक्षा की राजनीति लेकर आये हैं।

भारत के राजनेताओं को भारत को शिक्षित करने में डर हैं। कहीं राम के नाम पर, तो कहीं, हिंदू और मुस्लिम के नाम पर समाज को बाँट रहे हैं। नई राजनीति की उड़ान न भर कर कोई आगे आ पायेंगा, हम तो मौत के है सौदागर तुम कहाँ से निकल पाओंगे। आज भारत की राजनीति में शिक्षा के लिए कोई भी जगह नहीं बचा हैं। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण है भारत सरकार या यूँ कहा जाए कि मोदी सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग के केन्द्रीय राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा हैं। लोकतंत्र की भूमि पर जन्म हुआ पर मातृभूमि से कोई खास लगाव नहीं हैं। शिक्षा विभाग के केंद्रीय मंत्री होते हुए भी आज शिक्षा को भीख बना दिया हुआ हैं। राजनीति की गंदी लत ने हर खेल खेलने के लिए वैशाली को चुन लेते हैं। सरकरी विद्यालयों में महोदय कभी नहीं देखे जाते हैं। परंतु प्राईवेट स्कूलों में उसके उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि जरू बनते हैं। आज वैशाली जिले में 288 पंचायत, नगर पालिका और परिषद् लगभा हाजीपुर, महनार, लालगंज और महुआ मिलाकर 90-100 के बीच है। इन सभी जगहों पर प्राईवेट विद्यालयों की कम - से- कम संख्या होगी छोटी बड़ी मिलाकर 1000 विद्यालय। इन विद्यालयों में CBSE माध्यम से पढ़ाई होती हैं। लेकिन किसी भी विद्यालय में CBSE के मापदंडों पर पढ़ाई नहीं होती हैं। आज लगभग इसप्रकार के नियमानुसार विद्यालय चलाई जा रही हैं : 1. नामांकन : पहली बार : 15,000- 50,000 रूपये। 2. नामांकन : अगली कक्षा में : 5,000- 20,000 रूपये। 3. कपड़े : एक सेट : 1,000 - 5000 रूपये। 4. महीने का फीस : 500 - 5,000 रूपये। 5. गाड़ियों का भाड़ा : 500-3000 रूपये तक ( अब विद्यालय शहरों में छोटा सेंटर खोलकर गाँव में कई एकड़ जमीन पर विद्यालय बनाती है और बच्चों को 2 किलोमीटर से लेकर 10-25-50 किलोमीटर तक ले जाते हैं। बच्चों को पढ़ाई के जगह पर थकावट सुबह से ही होती हैं। 6. पुस्तक : CBSE : के अनुसार नहीं : जबकि स्कूलों पर बड़ी बड़ी सुनहरे अक्षरों में लिखा होता है CBSE माध्यम। लेकिन जब देश का केन्द्रीय मंत्री ही सोया हो तो CBSE क्यों आँख खोले। पुस्तकों के लिए : नर्सरी कक्षा में ही : 2,500 - 5000 रूपये की किताबें थोपी जाती हैं। 7. काँपी अब Branded ना हो तो स्कूलों में छात्रों को जो छोटे छोटे बच्चे हैं, उन्हें दूसरे बच्चों के साथ मैचिंग कराया जाता हैं। 8. योग्य शिक्षकों की पूर्ण कमी है, वैशाली के प्रत्येक प्राईवेट विद्यालय में। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विद्यालय आज व्यापक व्यापार का स्त्रोत बन गया है। जिला प्रशासन में भी इच्छा शक्ति की भारी कमी हैं। हिम्मत ही नहीं है कि वह जाकर स्कूलों से बातें कर सके, शिक्षा पर, विद्यालय की व्यवस्था पर एवं अनय बाते तो दूर की हैं वहीं जिला शिक्षा पदाधिकारी को खिचड़ी बँटवारा करने से फुर्सत ही नहीं है। वहीं अनपढ़ सांसदो और विधायकों में जाति का द्वेष फैलाने एवं हिंदू- मुस्लिम से समय ही नहीं मिलता हैं। वहीं सरकारी विद्यालयों में बिहार सरकार ही ताड़ी, दारु, दहेज बंदी में व्यस्त हैं और पुलिस अधीक्षक से लेकर एक चौकीदार तक लाख से अरबों की सम्पत्ति बनाने में व्यस्त है। तो स्कूल के सामने जुआरी, ताड़ी की गद्दी एवं दारू के ठेके देखने का फुर्सत ही नहीं हैं। शिक्षित अगर लोग होंगे, तो इन्हें ना वोट देंगे और ना ही घुस और ब्लैकमेल कर पैसा बना पाएँगे।

10-Apr-2018 05:22

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