21-Dec-2019 08:43

संसद द्वारा पारित कानून का विरोध क्यो ? : डाॅ. रुपक कुमार

सरकार को NRC और जनसंख्या नियंत्रण कानून लाख विरोध के बाद भी जल्द से जल्द लाने चाहिए, देश की बहुसंख्य आवादी इस प्रतीक्षा में है।

नागरिकता जैसे मामलों पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद को है, यह संघ सूची का विषय हैं। संसद द्वारा पारित कानून को अगर कोई राज्य नही मानती तो केन्द्र सरकार उस राज्य को मिलने वाली वित्तीय सहायता रोक सकती है साथ ही उस राज्य का शासन राष्ट्रपति अपने हाथ मे ले सकते है। यह भारत का संविधान कहता है। अब प्रश्न उठता है! आखिर जनता के प्रतिनिधि द्वारा बनाए गए कानून पर आपत्ति क्यो? भारत अजूबा देश है! घुसपैठियों को नागरिकता दिलाने के लिए यहाँ के लोग सड़क पर हिंसात्मक प्रदर्शन कर अपने ही देश के संसाधनों को नुकसान पहुंचा रहे है। आग लगाने वालो को यह भी पता नही कि CAB और NRC क्या है? विपक्ष भ्रम फैलाने मे लगी है कि जब NRC लागू होगा तो सबको नागरिकता साबित करने के लिए तरह तरह की डोक्युमेंट्स देने पड़ेंगे। जबकि ऐसा कुछ नही है, अन्य देशो मे भी NRC पहले से लागू है। हम इतना ही कहेंगे कि आग लगाने वालो "तूम अपने देश का हिस्सा जलाओं, मै अपने हिस्से का देश बनाउंगा।"

2014-2019 के बीच लगभग 550 नामचीन मुस्लिम परिवार को मोदी सरकार ने चुपके से नागरिकता प्रदान कर दी ये परिवार पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के थे जो भारत मे शरण चाह रहे थे। इसी मे अदनान शामी मसहूर गायक भी शामिल है। जब 40,000 रोहिंग्या इस देश मे म्यांमार से भाग कर घुसपैठ कर रहा था तब यही सरकार सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांग रही थी। भाई जो घुसपैठ कर रहा हो उसे बल पूर्वक रोकना चाहिए था। रोहिंग्या को अगर अरब अमीरात जैसे इस्लामिक देश शरण नहीं दे सकता तो हम क्यों शरण दे। उसी प्रकार CAB के नाम पर ईसाई को नागरिकता देना कहाँ तक उचित हैं, अगर इसाई प्रताड़ना के कारण दुसरे देश से भागकर भारत मे आया है तो हम ही उसे नागरिकता दे यह भी सही नहीं, क्योंकि पहले अमेरिका और इंगलैंड जैसे देशो की जिम्मेवारी बनती है कि वे इसाईयों को शरण दे, पर इस बात की चिंता किसी अन्य देश को नहीं पर भारत "वसुधैव कुटुंबकम" की अपनी महान परंपरा को त्यागना नहीं चाहती। यही उदारता इस देश के लिए हमेशा से घातक रही है। इसाई मिशनरी धर्मांतरण का रैकेट चलाकर इस देश मे अपना पांव पसार रही है और सरकार उसे ही नागरिकता प्रदान कर इसाई मिशनरी को सहयोग कर रही है। जो लोग संविधान का हवाला देकर धर्म निरपेक्ष राष्ट्र की बात कर रहे है उन्हें समझना चाहिए कि "धर्म निरपेक्ष राष्ट्र वह होता है जो कानून और संविधान से चलता है किसी धर्म से नहीं। साथ ही राष्ट्र अपने नागरिकों के साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं करता।" अब गौर करे! जो नागरिकता संशोधन विधेयक पारित हुआ यह शरणार्थी के लिए है न कि भारतीय नागरिकों के लिए, तो फिर भारत के किस धर्म के नागरिकों के साथ भेदभाव हुआ जो इतना बड़ा विरोध हो रहा है। दरअसल विपक्ष के लिए यह मुस्लिम वोट पर मुहर लगाने की राजनीत है और कुछ नहीं। भारत का जटिल धर्म निरपेक्ष संविधान आज तक अपने उद्देश्य "विविधता मे एकता" को तो प्राप्त नही कर सकी पर भारत के सभ्यता संस्कृति को नष्ट करने का रास्ता इजाद करती रही है।

अब नागरिकता संशोधन बिल 2019 के पहलू पर एक नजर देखे तो केंद्र सरकार के संशोधन से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हिंदुओं के साथ ही सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों के लिए अवैध दस्तावेजों के बाद भी भारतीय नागरिकता हासिल करने का रास्ता साफ हो गया। नागरिकता संशोधन कानून का पूर्वोत्तर के राज्य विरोध कर रहे हैं। पूर्वोत्तर के लोग इस बिल को राज्यों की सांस्कृतिक, भाषाई और पारंपरिक विरासत से खिलवाड़ बता रहे हैं। नागरिकता बिल 1955 के हिसाब से किसी अवैध प्रवासी को भारत की नागरिकता नहीं दी जा सकती। पर अब इस संशोधन के बाद इससे नॉन मुस्लिम रिफ्यूजी को सबसे अधिक फायदा होगा। भारत के प्रमुख विपक्षी दलों का कहना है कि मोदी सरकार CAB के माध्यम से मुसलमानों को टार्गेट करना चाहती है। इसकी वजह ये है कि CAB 2019 के प्रावधान के मुताबिक पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले मुसलमानों को भारत की नागरिकता नहीं दी जाएगी।

कांग्रेस समेत कई पार्टियां इसी आधार पर नागरिकता संशोधन बिल का विरोध कर रही हैं। सरकार का तर्क यह है कि धार्मिक उत्पीड़न की वजह से इन देशों से आने वाले अल्पसंख्यकों को CAB के माध्यम से सुरक्षा दी जा रही है। मोदी सरकार कहती है कि साल 1947 में भारत-पाक का बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ था। इसके बाद भी पाकिस्तान और बांग्लादेश में कई धर्म के लोग रह रहे हैं। पाक, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक काफी प्रताड़ित किये जाते हैं। अगर वे भारत में शरण लेना चाहते हैं तो हमें उनकी मदद करने की जरूरत है। 2003 मे मनमोहन सिंह ने भी राज्यसभा मे शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करने की वकालत किये थे। जनवरी 2019 में बिल पुराने फॉर्म में पास किया गया था। CAB और NRC वास्तव में NDA का चुनावी वादा है। गृह मंत्रालय ने वर्ष 2018 में अधिसूचित किया था कि सात राज्यों के कुछ जिलों के अधिकारी भारत में रहने वाले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से सताए गए अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने के लिए ऑनलाइन आवेदन स्वीकार कर सकते हैं। राज्यों और केंद्र से सत्यापन रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद उन्हें नागरिकता दी जाएगी। इसमें भारत की नागरिकता पाने के लिए 11 साल के निवास की जगह अब अवधि 5 साल हो जाएगी। विपक्षी दल CAB का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यह भारत के संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन करता है। आर्टिकल 14 समानता के अधिकार से संबंधित है। कांग्रेस, तृणमूल, सीपीआई (एम) जैसे दल CAB का विरोध कर रहे हैं। इसके साथ ही देश के पूर्वोत्तर के राज्यों में इस बिल का काफी विरोध किया जा रहा है। पूर्वोत्तर के राज्य के लोगों का मानना है कि CAB के बाद इलाके में अवैध प्रवासियों की संख्या बढ़ जाएगी और इससे क्षेत्र की स्थिरता पर खतरा बढ़ेगा। CAB का सबसे अधिक असर पूर्वोत्तर के सात राज्यों पर पड़ेगा। भारतीय संविधान की छठीं अनुसूची में आने वाले पूर्वोत्तर भारत के कई इलाकों को नागरिकता संशोधन विधेयक में छूट दी गई है। छठीं अनूसूची में पूर्वोत्तर भारत के असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम आदि शामिल हैं जहां संविधान के मुताबिक स्वायत्त ज़िला परिषद हैं जो स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 में इसका प्रावधान किया गया है। संविधान सभा ने 1949 में इसके ज़रिए स्वायत्त ज़िला परिषदों का गठन करके राज्य विधानसभाओं को संबंधित अधिकार प्रदान किए थे। छठीं अनूसूची में इसके अलावा क्षेत्रीय परिषदों का भी उल्लेख किया गया है. इन सभी का उद्देश्य स्थानीय आदिवासियों की सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखना है। इस समय तीन पड़ोसी देश से 31,313 लोग भारत में लंबी अवधि के वीजा पर रह रहे हैं। CAB से इन्हें तुरंत फायदा होगा। इसमें 25,000 से अधिक हिंदू, 5800 सिख, 55 इसाई, 2 बौद्ध और 2 पारसी नागरिक शामिल हैं।

21-Dec-2019 08:43

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