03-Apr-2020 01:51

गरीबी रेखा की बजाय अमीरी रेखा बननी चाहिए :- रमेश कुमार चौबे, महासचिव नागरिक अधिकार मंच l

भारतीय जनक्रान्ति दल की सरकार बनी तो आयकर विभाग को समाप्त किया जायेगा :- रमेश कुमार चौबे, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय जनक्रान्ति दल l

गरीबी रेखा की बजाय अमीरी रेखा बननी चाहिए :- रमेश कुमार चौबे, महासचिव नागरिक अधिकार मंच l भारतीय जनक्रान्ति दल की सरकार बनी तो आयकर विभाग को समाप्त किया जायेगा :- रमेश कुमार चौबे, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय जनक्रान्ति दल l अमीरी रेखा क्यों जरूरी है पूरी दुनिया में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था चल रही है जिसके कारण मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लगातार संपत्ति का केंद्रीयकरण होता जा रहा है। यह स्थिति अत्यंत दयनीय है क्योंकि यदि किसी व्यक्ति के पास काम करने के लिए कोई पूंजी नहीं हो तो योग्यता क्षमता और मेहनत के द्वारा वह उस काम को नहीं कर सकता जब तक उसके पास उचित मात्रा में कुंजी नहीं हो। लेकिन आज यही समस्या बहुत गंभीर हो चुकी है। पूंजी के निरंतर केंद्रीयकरण को रोकने का सही और न्याय पूर्ण उपाय अमीरी रेखा बनाना है इसका मतलब यह है कि हर व्यक्ति को अपनी जरूरतों के अनुसार कमाए गए धन का अपने उपभोग के लिए करने का पूरा अधिकार होना चाहिए लेकिन संपत्ति की सीमाहीन जमाखोरी करने का अधिकार नहीं होना चाहिए और उसकी एक अधिकतम सीमा तय होनी चाहिए जिसे हम अमीरी रेखा कहते हैं। ऐसा होना इसलिए जरूरी है क्योंकि सारे प्राकृतिक संसाधनों पर सबका समान मूलभूत अधिकार होता है किसी भी व्यक्ति का यह मूलभूत अधिकार छीनना उसके साथ अन्याय है और शोषण भी है इससे वह व्यक्ति अपनी योग्यता क्षमता और कार्यकुशलता के अनुसार काम नहीं कर सकता और दूसरों के शोषण का शिकार होने के अलावा उसके पास जीने का कोई रास्ता नहीं बचता।  इसलिए यदि हम चाहते हैं कि प्राकृतिक संसाधन हर व्यक्ति को सहज रूप से और समान रूप से सबको मिलते रहे तो सीमाहीन संपत्ति इकट्ठी करने की आदमी की लोग लालच की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का उपाय करना होगा और इस पर अंकुश लगाए बिना हम समाज में अच्छी व्यवस्था स्थापित नहीं कर सकते।

अमीरी रेखा बनाने का मतलब यह  है कि समानता के आधार पर हर आदमी औसत सीमा तक संपत्ति रखने का मूलभूत अधिकार रखता है और उससे अधिक संपत्ति का उसे मालिक नहीं मानना चाहिए बल्कि उसे समाज का कर्जदार मानना चाहिए और अधिक संपत्ति पर ब्याज की दर से संपत्ति कर लगाया जाना चाहिए जो पूरे समाज की सामूहिक आय मानी जाए। आज तक पूरी दुनिया में जो कर प्रणाली है वह तर्क हीन है और न्याय से उसका कोई लेना देना नहीं है। यह एक बहुत ही गंभीर बात है कि न्याय की दृष्टि से विचार करने की बजाय समाज पर किसी भी प्रकार का कर लगा दिया जाता है और उससे  गरीब लोगों का शोषण होता है। इसी शोषण के कारण गरीब आदमी गरीब होता जाता है और अमीर आदमी अमीर होता जाता है।  इसका कारण यह है कि आज उपभोग की हर चीज पर कई प्रकार के टैक्स लगे हुए हैं जिससे उपयोग में लाई जाने वाली हर चीज महंगी हो जाती है जिससे कम आय पाने वाले लोगों का जीवन और भी मुश्किल हो जाता है जिससे उनका पेट भी नहीं पढ़ पाता। इसलिए उपभोग की किसी भी चीज पर कोई टैक्स नहीं होना चाहिए और केवल अमीरी रेखा से अधिक संपत्ति पर संपत्ति कर लगाया जाना चाहिए।  क्योंकि अमीरी रेखा से अधिक संपत्ति बहुत कम लोगों के पास होती है इसलिए इन मुट्ठी भर लोगों पर संपत्ति कर लगाना बहुत ही आसान तो होगा ही इसके अलावा इससे मिलने वाला टैक्स भी भारी मात्रा में होगा जिससे समाज अपने सारे सामूहिक खर्च काटकर भी भारी बचत कर लेगा जिसे सब लोगों में बिना किसी भेदभाव के लाभांश के रूप में बराबर बराबर बांटकर सबके जीवन के अभाव शोषण को खत्म किया जा सकता है।

पूंजीवादी विचारधारा में सबसे बड़ी गलती यह है कि वह एक व्यक्ति के संपत्ति अधिकार की ना तो कोई सीमा मानती है और ना ही कोई संपत्ति कर लगाती है और सारा टैक्स उपभोग की चीजों पर लगा कर समाज में कमजोर लोगों का जीना मुश्किल कर देती है। लेकिन यदि सारे करो को हटाकर केवल अमीरी रेखा से अधिक संपत्ति पर कर लगाया जाए तो वह कर केवल मुट्ठी भर अमीरों को ही देना होगा और बाकी किसी भी व्यक्ति को कोई कर नहीं देना होगा बल्कि हर व्यक्ति को लाभांश (नागरिक भत्ता) के रूप में इतना धन मिलता रहेगा कि वह अभाव मुक्तजीवन आसानी से जी सके।इससे जहां एक ओर तो गरीबी समाप्त हो जाएगी वहीं दूसरी ओर अमीरों को भी अपना जीवन जीने में कोई कठिनाई नहीं होगी क्योंकि अमीरों पर जो संपत्ति कर लगेगा वह बहुत कम होगा और शेष बचे धन से वे लोग अपना कारोबार पहले की तरह करते रहेंगे। इससे समाज में होने वाला धन का केंद्रीयकरण एक सीमा से आगे नहीं बढ़ेगा और सब लोगों को अपनी योग्यता क्षमता और रूचि के अनुसार अर्थव्यवस्था में भागीदारी मिलती रहेगी।

लेकिन जब तक अमीरी रेखा बनाकर केवल संपत्ति कर नहीं लगाया जाता और उपभोग की वस्तुओं पर कई प्रकार के टैक्स लगाए जाते रहेंगे तब तक समाज में आर्थिक असमानता को लगाम नहीं लगाई जा सकती और ना ही गरीबों का शोषण रोका जा सकता है। अमीरी रेखा से अधिक संपत्ति पर संपत्ति कर लगाना इसलिए भी न्याय पूर्ण और व्यवहारिक है क्योंकि प्राकृतिक संसाधन ही संपत्ति होते हैं और अर्थव्यवस्था में यही संसाधन पूंजी होते हैं और इस पूंजी पर सबका समान जन्मसिद्ध अधिकार होता है इसलिए कोई भी व्यक्ति यदि औसत सीमा से अधिक संपत्ति का संग्रह करता है तो वह अपने न्याय पूर्ण अधिकार से अधिक पूंजी का उपयोग करता है और उससे औसत सीमा से अधिक संपत्ति पर ब्याज की दर से संपत्ति कर लगाकर उसे सब लोगों में समान रूप से बांटना पूरी तरह सही है और उपभोग की किसी भी वस्तु पर कोई भी कर लगाना गलत और अन्याय है। यह बात भी विचारणीय है  कि  जब किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन में सीमा ही संपत्ति की जरूरत ही नहीं होती तो फिर सीमाहीन संपत्ति अधिकार किसी को भी होना ही नहीं चाहिए और उसे स्वतंत्रता और सुख से रहने के लिए औसत मात्रा में धन रखने की छूट देकर उसे पूरी तरह भविष्य की सुरक्षा देकर चिंता मुक्त रखना चाहिए। साभार :- श्री रौशन लाल अग्रवाल, ख्यातिप्राप्त आर्थिक चिंतक (आर्थिक न्याय संस्थान)

03-Apr-2020 01:51

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