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हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने धर्म के आधार पर देश के विभाजन का बीज बोया

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल जिन्ना ह को तवज्जो देकर कांग्रेस की देश को आजाद करने की मांग को दरकिनार करना चाह रहे थे और विभाजन का प्रस्ताव रख रहे थे।

देश के विभाजन का विचार हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग का था। कांग्रेस ने हमेशा से ही इसका विरोध किया। संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान गृहमंत्री अमित शाह का यह बयान भ्रामक और गलत है कि यदि कांग्रेस देश का विभाजन नहीं करती तो हमें यह बिल लाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। भारत के विभाजन का मूल विचार हिंदू महासभा के नेता वी डी सावरकर और मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्नाह का था । जिन्नाह इस विचार के जरिए अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को किनारे लगाना चाहते थे तो हिंदू महासभा पाकिस्तान से अलग एक हिंदू राष्ट्र का सपना देख रहा था । इस विचार के बीज 1923 में पड़ चुके थे 1940 में यह विचार और परवान चढ़ा । सावरकर के इस बी ज को जिन्नाह ने पानी देना शुरू किया।

जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी शुरू से ही इस विचार के खिलाफ थे। 1939 के अंत में जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ तो तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलीथिगो को कांग्रेस से विश्व युद्ध में इस तरह का समर्थन नहीं मिला जिसकी उन्हें अपेक्षा थी। अंग्रेज हुकूमत को विश्व युद्ध में समर्थन और मदद करने को लेकर जवाहरलाल नेहरू और गांधी जी में भी मतभेद थे इसके बावजूद कांग्रेस ने अंग्रेजों को विश्व युद्ध में इस शर्त पर समर्थन देने का वादा किया कि युद्ध के बाद देश को स्वतंत्रता मिल जाएगी। वहीं दूसरी और जिन्ना अधिक चतुराई दिखा रहे थे, जहां कांग्रेस ने ब्रिटिश हुकूमत पर दबाव बनाया वही जिन्ना ने बंगाल,पंजाब सिंध के समर्थन में लॉर्ड लिनले थी गो के साथ बातचीत करना शुरू कर दिया वह मुस्लिम लीग के नेता के बतौर अलग पाकिस्तान जाने पर आमादा थे। अंततः जिन्नाह और हिंदू महासभा दोनों ने ही भारत छोड़ो आंदोलन से किनारा कर लिया।

कांग्रेस को इस बात के लिए जवाबदार जरूर ठहराया जा सकता है कि वह जिन्ना ह को पृथक राष्ट्र की जिद छोड़ने के लिए मना नहीं सकी ना ही ब्रिटिश सरकार को इस बात पर राजी कर सकी कि वे जिन्ना की मदद ना करें। लेकिन यह बात पूरी तरह से गलत है कि कांग्रेस ने देश के विभाजन का समर्थन किया। विभाजन से पहले ही जिन्ना और कांग्रेस के बीच बातचीत टूट चुकी थी ।उस वक्त दोनों ही पार्टियों में कट्टरवादी रुझान वाली कई धाराएं मौजूद थीं। जो देश के विभाजन को लेकर अपनी चालें चल रही थीं। 1946 तक कांग्रेस धर्म के आधार पर विभाजन का विरोध करती रही।

इसके बाद पश्चिम बंगाल में दंगे भड़कने से जिन्ना और नेहरू में नई दरार पैदा हो गई । जिन्ना ने पाकिस्तान के लिए एक अलग राष्ट्र की मांग करने को लेकर डायरेक्ट एक्शन की घोषणा कर दी। अगस्त 1946 में शुरू हुए इन दंगों में सैकड़ों, हजारों लोग मारे गए । पश्चिम बंगाल के नोआखली और बिहार तक हालात बेकाबू हो गए। ऐसी ही परिस्थिति में संभवत कांग्रेस के नेताओं में इस बात पर सहमति हुई होगी कि जिन्ना के इस विचार के साथ और लड़ाई नहीं की जाए। इसके बाद इस विचार पर ब्रिटिश हुकूमत ने आक्रामकता के साथ काम किया और इसे लागू कर दिया। गृह मंत्री अमित शाह के बयान का संक्षिप्त में जवाब यह है कि कांग्रेस ने कभी भी धर्म के आधार पर देश के विभाजन का विचार नहीं बोया, वह आखिर तक बेहतर विकल्पों पर विचार करती रही।

12-Dec-2019 10:07

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