14-Apr-2020 07:13

फ़ुर्सत के पल में *क्षत्रिय दर्पण *

बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह की कलम से पढ़िए आज खास आलेख

सृष्टि में मानव सभ्यता के उदय - विकास के साथ कर्म के आधार पर क्षत्रिय पुरुष का एक योद्धा के रूप में अवतरण हूवा।राष्ट्र , धर्म , वचन,समाज की रक्षा के साथ अन्याय के लिए लड़ना कर्तव्य संस्कार के साथ स्थापित है। सत्य है कि अतीत काल से देश, धर्म, न्याय, समाज की रक्षा और शासन का भार वहन करती रही है।राजपूत का शब्दार्थ है, राजा के पुत्र अथवा शासकों के वंशज।राजपूतों का संबंध क्षत्रियों से है।प्रत्येक राजा प्रायः क्षत्रिय हुआ करते थे।अतः राजपूत्र का अर्थ क्षत्रिय से माना गया। प्राचीन वर्ण व्यवस्थानुसार इसी जाति का नाम क्षत्रिय है ।मनुस्मृति में कहा कि क्षत्रिय शत्रु के साथ उचित व्यवहार और कुशलता पूर्वक राज्य विस्तार तथा अपने क्षत्रित्व धर्म में विशेष आस्था रखना क्षत्रियों का परम कर्तव्य है। हमेशा ब्राह्मणों का आदर -सम्मान और उनके वचन को ऊँचा प्राथमिकता दिए है।प्रजा का ख़्याल ,दुःख - पीड़ा स्वयं की तरह समझते है। ईश्वर का अवतार इस कुल में हूवा है ।क्षत्रिय अर्थात् वीर राजपूत सनातन वर्ण व्यवस्था का वह स्तम्भ है जो भगवान की भुजाओं से जन्म पाया है।क्षत्रिय की उपाधि से अतंकृत क्षत्रिय के लिये गीता में कहा गया कि :-शूरवीरता, तेज, धैर्य, युद्ध में चतुरता,युद्ध से न भागना, दान, सेवा, त्याग, शास्त्र ज्ञान , कुशल शासक क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्तव्य - कर्म कहे गये हैं। पूर्व काल में क्षत्रिय वंश के उद्भव का प्रारम्भिक संकेत पुराणों से मिलने लगता है कि सूर्यवंश और चंद्रवंश ही क्षत्रिय वंश परम्परा के मूल स्त्रोत है।क्षत्रिय वंश में आदि रूप ब्रह्मा जी से जन्मे मरीचि, फिर इसी वंश के इक्ष्वाकु, मांधाता, हरिश्चंद्र, सगर, दिलीप, भगीरथ, ययाति , दशरथ और भगवान राम जैसे प्रतापी राजा हुए है।हर क्षत्रिय को स्वयं के लिए अनुकरणीय शब्द , प्रभू श्री राम ने युध में रावण से कहा “ युद्ध जितने के लिये शस्त्र शास्त्र के साथ आध्यात्मिक शक्ति और धर्म भी आवश्यक होता है”।

क्षत्रिय कुल में विश्वामित्र जैसे महर्षि हुए।सूर्य वंश का केंद्र स्थान अयोध्या था , जो आज उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अंतर्गत एक परगना मात्र है,और चंद्र वंश का केंद्र स्थान प्रयाग था , जो आज उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के नाम से प्रसिद्ध है।इन दोनों वंशों की सैकड़ों पीढ़ियों ने धर्म न्याय के साथ शासन किया।क्षत्रिय कुल में जन्मे राजा भरत के नाम से भारत देश का नाम है।इन क्षत्रियों के बीच आपस में एक बहुत बड़ा युद्ध हुआ था , जो महाभारत के नाम से विख्यात है।इस महायुद्ध में क्षत्रिय जाति के वंश के वंश विध्वंस हो गये । कलयुग में चकवती सम्राट विक्रमादित्य शूरवीर हुए जो विक्रम सम्वत् प्रारम्भ किए।देश रक्षा का भार वहन करने वाली यह जाति आपस में लड़ कर इतनी निर्बल हो गई कि देश की भूमि विदेशियों( शकों) के पैरों से कुचली जाने लगी।क्षत्रिय कुल में पैदा हुवे बुद्ध , महावीर से देश में नवीन धर्म का उदय हुआ। अहिंसा मुख्य विचार हूवा।इस मत के प्रचार से देश के विचारकों में ऐसा परिवर्तन हुआ कि देश का क्षत्रियत्व और भी निर्बल हो गया।राजपूतों द्वारा संस्थापित राजसिंहासन उनके अधिकार से निकल गये।आक्रांताओं से देश का उद्धार करने के लिए वशिष्ठ मुनि तथा अन्य ऋषि मुनियों ने मिलकर आबू पर्वत पर एक यज्ञ का आयोजन किया और उस यज्ञ के अग्निकुंड से अग्नि वंश नाम के क्षत्रिय वंश की सृष्टि पर उदय हुई । ," पंवार , चौहान , सौलंकी ,और पडिहार नाम के राजपूत वंश इसी अग्निवंश की शाखाएं हैं।बीतते वक़्त में अनेक शाखाएं उप-शाखाएं बनती गई।क्षत्रियत्व संस्कृति से जुड़े और भी कुछ उपाधि धारक आज है जो सभी क्षत्रिय है उनका भी सदीयो पुराना इतिहास रहा है।उन क्षत्रिय शाखाएँ की चर्चा करना वर्तमान में उचित नही है।भारत के मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास के पन्नों में राजपूत की वीरता , राष्ट्र भक्ति , न्याय ,त्याग , बलिदान की गाथाएं स्वर्ण अक्षरों से इतिहास के पन्नों में दर्ज है।अनेक वीर योद्धा मातृभूमि की रक्षा के लिए स्वयं प्राणो की आहुति दे दिए।सिख समाज के दस गुरुओं में से नौ क्षत्रिय कुल के है। सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने पूरे परिवार की आहुति दे दीए।महाराणा प्रताप , शिवाजी महाराज बाबू कुँवर सिंह जैसे असंख्य राजपूत योद्धाओं ने राष्ट्रभक्ति में अपनी जान की बाज़ी लगा दी।भारत के सभी समाज के राष्ट्रभक्तों के संघर्ष , वीरता , त्याग , बलिदान से देश आज़ाद हूवा।

आज़ादी के सतर वर्ष बीत जाने के बाद भारत के गौरवशाली इतिहास के कर्मयोद्धा कहा खड़े है।इसकी समीक्षा करने की ज़रूरत है।हमारा इतिहास दर्पण है।जिस प्रकार हम दर्पण में ख़ुद के चेहरे को देख कर अपने दाग़ को हटाते है और सुंदर दिखने की कोसिस करते है।उसी तरह अपने इतिहास रूपी दर्पण में देख कर उस वक़्त की अच्छाई को अपनाकर इतिहास की भूल को सुधार कर अपनी पहचान स्थापित करने का पुनः संकल्प की ज़रूरत है।एक शक्तिशाली , विकसित राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की ज़रूरत है।हम सत्य के साथ लिखता हु की वर्तमान समय में क्षत्रिय समाज हर क्षेत्र में आगे की पंक्ति में खड़ा नही है जिसे सच्चाई के साथ स्वीकार करने की ज़रूरत है।हर क्षेत्र में वक़्त कहता है की हम आपस में एक दूसरे का पैर खिंचने की सोच का त्याग कर हाथ खिंचने की ईमानदारी से प्रयास करे।अपने अंदर के अहंम का त्याग करे। एक दूसरे से पुरानी विवादों को ख़त्म करते हुए क्षमय - क्षमा के सुंदर मार्ग पर चले।आज दृष्टिगोचर होते रहता है कि क्षत्रिय समाज के लोकप्रिय चेहरे अन्य क्षेत्रों में या राजनीति में एक दूसरे की पीठ पीछे आलोचना सुनने या देखने को मिलते रहता है।

इसके कारण वे जाने - अनजाने में स्वयं के सम्मान , ताक़त खोते जा रहे है और समाज भी कमज़ोर होते जा रहा है।आज समाज की दुःख , पीड़ा को बुद्धि विवेक के साथ ज़िला , राज्य और राष्ट्र स्तर पर मज़बूती से आवाज़ उठाने वाला नायक कुछ अपवाद छोड़ कर नही दिख रहा है।अपवाद का नाम खोलना उचित नही है। देश राज्य या जिले स्तर पर ईमानदारी से ध्यान लगाने पर नज़र आ जाएगा।इतिहास हमें शिक्षा देता है कि सभी समाज के लोग हमारे लिए प्रिय हर काल - खंड में रहे है।एक दूसरे का विश्वाश किए है। आज भी उसी पूर्वजों के मार्ग पर चलकर समाज के सभी लोगों से विश्वास , सहयोग भरोसे पर खड़े उतरे।ये सच्चे क्षत्रिय का परमधर्म और कर्तव्य है।क्षत्रिय भाइयों अंत में कहूँगा:- सिर्फ सांसे चलते रहने को ही ज़िन्दगी नही कहते आँखों में कुछ ख़वाब, दिल में उम्मीदे लिए फिर से दृढ़ संकल्प के साथ अपने पूर्वजों के मार्ग पर चलकर क्षत्रिय समाज के उज्जाले का सूरज उदय करना है।जिसके प्रकाश से भारत विश्व में प्रेम , भाईचारे, प्रगति के साथ महाशक्ति के शिखर पर स्थापित हो जाए।

14-Apr-2020 07:13

व्यक्तित्व मुख्य खबरें

समाचार भारत_दर्शन राजनीति खेल जुर्म शिक्षा चिकित्सा धर्म परम्परा व्यक्तित्व कला सम्मान फिल्म सामाजिक_संस्थान रोजगार कानून अर्थव्यवस्था समस्या पर्यावरण सैनिक पुलिस गांव शहर ज्योतिष सामान्य_प्रशासन जन_संपर्क छात्र_छात्रा
Copy Right 2020-2025 Ahaan News Pvt. Ltd. || Presented By : CodeLover Technology