07-Apr-2020 09:50

चुनावी जुमला साबित होता छठे चरण का शिक्षक नियोजन

शिक्षक नियोजन की आस लगाए हजारों शिक्षक अभ्यर्थियों के अरमान पर पानी फिर सकता है, सरकार की लापरवाही से छठे चरण का शिक्षक नियोजन कोरोना वायरस की भेंट चढ़ा

जिले में छठे चरण 2019-20 के अंतर्गत जारी प्रारंभिक शिक्षक नियोजन की प्रक्रिया में शामिल हजारों अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में लटकता प्रतीत हो रहा है. विगत 21 जनवरी को माननीय उच्च न्यायालय पटना के द्वारा निर्गत न्याय निर्देश के अनुपालनार्थ एनआईओएस से 18 माह का डीएलएड प्रशिक्षण उत्तीर्ण शिक्षक अभ्यर्थियों को छठे चरण के प्रारंभिक शिक्षक नियोजन में शामिल करने के निर्देश पर विधिक विभाग से परामर्श आने तक नियोजन की प्रक्रिया को शिक्षा विभाग के द्वारा 11 फरवरी को निर्गत पत्र के प्रभाव से स्थगित कर दिया गया. जिसके उपरान्त हजारों बेरोजगार युवक शिक्षक बनने की योग्यता रहने के बावजूद बेरोजगारी का दंश झेलने को विवश है.

विदित हो कि शिक्षा विभाग के द्वारा 11 फरवरी को ही छठे चरण के प्रारंभिक शिक्षक नियोजन की प्रक्रिया को स्थगित किया गया. उसके उपरांत आज तक 2 माह बीतने को है फिर भी सरकार की लापरवाही या विभागीय उदासीनता जो कहे जिसके कारण हजारों शिक्षक अभ्यर्थियों का भविष्य अंधकारमय प्रतीत हो रहा है. इस पर टीईटी एसटीईटी उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ गोपगुट के जिला अध्यक्ष श्री प्रेम शंकर सिंह ने कहा कि सरकार रोजगार सृजन से संबंधित जन कल्याणकारी योजनाएं चुनावी वर्ष को ध्यान में रखते हुए ही चलाती है. जो केवल चुनावी जुमला ही साबित होता है. यदि ऐसा नहीं होता तो बिहार सरकार के द्वारा आज से 5 वर्ष पूर्व राज्य में कार्यरत नियोजित शिक्षकों का सेवा-शर्त निर्धारण के लिए बनायी गयी उच्च स्तरीय कमिटी जो आज तक अपना रिपोर्ट नहीं दे पाई. ये इसका ज्वलंत उदाहरण है. जिसके कारण आज सूबे के लाखों प्रारम्भिक से लेकर माध्यमिक तक के नियोजित शिक्षक अपने मौलिक अधिकारों को पाने की खातिर अनिश्चितकालीन हड़ताल करने के लिए विवश है.

एक तरफ यह सरकार बार-बार दंभ भरती है कि बिहार में बहार है, सुशासन की सरकार है. विकास पुरूष के नाम से जाने जाने वाले माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अनुसार इनसे पहले बिहार में जंगलराज था तो क्या यही सुशासन की सरकार है जिनके सुशासन में सरकार के निर्देशों को उनके अंदर कार्य करने वाले मुलाजिम तक नहीं मानते हैं. यदि मानते तो ऐसा नहीं होता. इस परिस्थिति में यह भी विचारणीय है कि विगत 11 फरवरी को शिक्षा विभाग के द्वारा यह कहा गया कि एनआईओएस से 18 माह का प्रशिक्षण प्राप्त किए हुए अभ्यर्थियों को माननीय उच्च न्यायालय पटना के आदेशानुसार नियोजन की प्रक्रिया में तभी शामिल किया जा सकता है जब तक विधिक विभाग से परामर्श न ली जाए. सवाल उठता है कि यह विधिक विभाग भी सरकार का ही एक अंग है. जब सरकार के द्वारा यह निर्णय लिया गया कि विधिक विभाग के परामर्श के उपरांत ही ऐसे अभ्यर्थियों को छठे चरण के प्रारंभिक शिक्षक नियोजन की प्रकिया में सम्मिलित किया जाएगा, तो किस परिस्थिति में 11 फरवरी के उपरांत आज तक विधिक विभाग के द्वारा परामर्श नहीं दिया गया और ना ही सरकार के द्वारा इसके लिए कोई ठोस अग्रेत्तर कार्रवाई की गई. इस परिस्थिति में हम कह सकते हैं कि सरकार जो भी योजनाएं चला रही है वह केवल चुनावी मुद्दा ही होता है. ऐसी ही लोकलुभावन योजनाएं सरकार संचालन करती है जिससे लोग आकर्षित होकर के सरकार के पक्ष में अपना जनादेश दें.

इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि सरकार इस पर यह कहकर आपना पल्ला झार लेगी कि वर्तमान में कोरोना वायरस के संक्रमण से फैली वैश्विक महामारी के कारण शिक्षक नियोजन एवं सेवा-शर्त पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। इस परिस्थिति में संघ के जिला उपाध्यक्ष विमलेश कुमार सिंह, जिला सचिव संजीव कुमार, जिला महासचिव पंकज कुमार, और जिला मीडिया प्रभारी राजेश कुमार पासवान ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए एहतियातन केन्द्र सरकार द्वारा घोषित लॉक डाउन समाप्त होने के उपरांत सरकार द्वारा यदि नियोजित शिक्षकों को पूर्व से गठित सेवा शर्त कमेटी की रिपोर्ट के आलोक में सेवा-शर्त का लाभ और छठे चरण 2019-20 के के अन्तर्गत प्रारंभिक शिक्षक नियोजन में शामिल अभ्यर्थियों के लिए नियोजन की प्रक्रिया को प्रारंभ करते हुए कैंप के माध्यम से हाथों-हाथ नियोजन पत्र निर्गत करने के लिए तिथि निर्धारित नहीं कि जाता है तो इसके लिए राज्य के महामहिम राज्यपाल से संघ के द्वारा अनुरोध किया जाएगा कि सरकार आचार संहिता लागू होने के पूर्व इन सभी महत्वपूर्ण कार्यों को ससमय पूरा करें अन्यथा की स्थिति में जितने भी अभ्यर्थी हैं वह संघ के बैनर तले आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे और इसकी पूर्ण जिम्मेवारी बिहार सरकार की होगी।

07-Apr-2020 09:50

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