13-Jun-2018 11:52

राजनीतिक पद छह माह में भरें जाते, पर शैक्षणिक संस्थानों के पद 30 वर्षो से खाली

लोकतंत्र के हत्यारों ने जहाँ आम आदमी के लिए मूलभूत सुविधाओं में शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, कृषि, भोजन, हवा, पानी, बिजली आदि पर सिर्फ वादें और जुमले फेंकूओं द्वारा फेंंका जाता हैं। हर बार की तरह फिर राजनेता और ब्यूरो क्रेट्स पिछले दरवाजें से भाग गयें और फँस गय

दुर्भाग्य से एक बार फिर राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी बच निकले और छात्र और अभिभावकों से ही दलाली करती पुलिस टीम सवाल करने आ गई। बिहार में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री होते हुए भी बिहार के शिक्षा विभाग में के एन प्रसाद वर्मा, शिक्षा मंत्री, बिहार सरकार नींद में ही लगते हैं। बिहार की शिक्षा व्यवस्था सवालोंं के घेरे मेंं है, कभी टॉपर घोटाले को लेकर चर्चा मेंं रहा बिहार एक बार फ़िर से सुर्खीयोंं मेंं हैंं। लेकिन इस बार का मामला मेधा को लेकर नहींं बल्कि मामला है तो विद्यालय मेंं उपस्थिति को लेकर। बिहार बोर्ड की साइंस टॉपर छात्रा बिहार बोर्ड के विद्यालय मे पढ़ाई ही नही की। इससे छात्रा की मेधा या रिजल्ट पर कोई सवाल खड़ा नहींं किया जा सकता। बोर्ड द्वारा यह दलील दिया जाना कि इंटर परीक्षा मेंं परीक्षार्थी की स्कूल मेंं न्यूनतम उपस्थिति संबंधित बाध्यता नहींं है तो फिर विद्यालय मेंं मिलने वाली सुविधाओ के लिए उपस्थिति बाध्यता क्योंं ? सवाल उठता है कि बिहार बोर्ड के विद्यालय मे बगैर पढ़े परीक्षार्थी को परीक्षा मेंं बैठने की अनुमति कैसे मिल जाती है ? सुशासन बाबू जरूरत है इन अहम पहलुओ पर गंभीरतापूर्वक विचार करने का । नहींं तो आये दिन इसी तरह सिस्टम पर सवाल उठाए जाते रहेगेंं और प्रदेश की किरकिरी होती रहेगी। ज्ञात हो कि रूबी राय और गणेश कुमार के बाद अब बिहार बोर्ड 2018 के नतीजों में 12वीं कक्षा की सांइस टॉपर कल्पना कुमारी टॉपर घोटाला और फर्जीवाड़ा में फंस गई हैं। दरअसल बीते दिनों कल्पना ने नीट 2018 परीक्षा में ऑल इंडिया में टॉप किया है।इसके लिए कल्पना ने आकाश इंस्टीट्यूट में कोचिंग की थी। अब सवाल यह है कि अगर कल्पना पिछले 2 सालों से दिल्ली में रेगुलर मेडिकल कोचिंग कर रहीं थीं तो बिहार के शिवहर में उनकी जगह स्कूल में हाजिरी किसने लगाई ? वहीं जो 12 लाख बच्चों ने बिहार बोर्ड की इंटर परीक्षा दी थी, उनमें आधे बच्चे ऐसे स्कूलों/कालेजों में पढ़ते थे, जिनके शिक्षकों को वेतन नहीं मिलता। एक अव्यावहारिक नियम के तहत कुछ ग्रांट का प्रावधान है, जो भी बीते 4 वर्षों से नहीं मिला। जी हां...4 वर्षों से वेतन के नाम पर ढेला भी नहीं। ये वित्त रहित स्कूलों/कालेजों के शिक्षक हैं जिनकी करुण गाथा देश ही नहीं, दुनिया के अखबारों में वर्षों से छपती रही है। बचे आधे बच्चों ने ऐसे सरकारी स्कूलों/कालेजों में पढ़ाई की जिनमें फीजिक्स, गणित, अंग्रेजी आदि के शिक्षक ही नहींं थे। किसी इक्का-दुक्का स्कूल/काँँलेज में विलुप्त होती प्रजाति की तरह इन महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षक मिल जाते हैं। जिन विषयों में शिक्षक हैं भी, वे सालों भर वेतन का रोना रोते रहते हैं क्योंकि उन्हें महीनों-महीनों तक वेतन ही नहीं मिलता। असम्मानजनक सेवा शर्त्तों और बेहद कम वेतन की शिकायतें लेकर वे अक्सर राजधानी में राजा के दरबार में न्याय की घण्टी बजाने जाते हैं, धरना करते हैं, प्रदर्शन करते हैं...और फिर पुलिस की लाठियाँँ खा कर या तो अस्पताल में भर्त्ती होते हैं या जख्म सहलाते घर लौटते हैं। जिन वित्त रहित स्कूलों/कालेजों में बिहार के आधे से अधिक बच्चे पढ़ते हैं, उनमें अपवादों को छोड़ कर कहीं पढ़ाई नहीं होती। बच्चे नामांकित होते हैं, फिर वे परीक्षा फॉर्म भरने के समय ही अपने स्कूलों/काँँलेजों का मुंह देखते हैं। वे अपने किसी शिक्षक को नहीं जानते क्योंकि अमूमन छात्र और शिक्षक की कभी भेंट ही नहीं होती। हां... वे बच्चे और उनके अभिभावक उस दलाल को जरूर जानते हैं जिसके माध्यम से उन्होंने नामांकन कराया है। यह दलाल आम तौर पर उस वित्त रहित स्कूल/कॉलेज का कोई शिक्षक या कर्मचारी होता है। कोई भी समस्या होने पर बच्चे/अभिभावक उसी दलाल के पास दौड़ते हैं, जो पूरी निष्ठा के साथ उनकी समस्याओं से जूझता है, उन्हें प्रैक्टिकल आदि में अच्छे नंबर दिलवाने की जिम्मेवारी लेता है। दलाल को दिया जाने वाला पैसा उस फीस से अलग है जो स्कूल/कॉलेज उस बच्चे की पढ़ाई/परीक्षा आदि के नाम पर वसूलते हैं। किसी इंटर स्कूल/कॉलेज में प्रैक्टिकल नहीं होता। अपवाद हो सकते हैं ? यहां तो विश्वविद्यालय शिक्षा का भी आलम यह है कि बच्चा फीजिक्स, केमेस्ट्री, जूलॉजी आदि में बीएससी आनर्स फर्स्ट क्लास की डिग्री पा जाता है, लेकिन उसने प्रैक्टिकल कक्ष का मुंह तक नहीं देखा होता है। हाँ... प्रैक्टिकल परीक्षा में वे शामिल होते हैं और अमूमन थ्योरी से अच्छे नंबर लाते हैं। मैट्रिक पास करने के बाद जब बच्चे इंटर साइंस में एडमिशन लेते हैं तो अपने स्कूल/कॉलेज जाने की फिर कोई जरूरत महसूस नहीं करते। ऐसे अभिभावक, जो थोड़े जागरूक हैं, एडमिशन दिलाने के तत्काल बाद किसी निजी कोचिंग संस्थान का रुख करते हैं। उसके बाद बच्चे, जिन्हें नियमित स्कूल/कॉलेज जाना चाहिए था, वे नियमित कोचिंग सेंटर जाते हैं। वहीं वे भविष्य के ताने-बाने बुनते हैं, लड़ाईयां करते हैं, प्रेम करते हैं। कोचिंग सेंटर के सर जी ही उसके असली शिक्षक होते हैं। गांव-गांव, गली-गली इंटर के कोर्स को पढ़ाने के लिये कोचिंग सेंटर खुले हुए हैं जिनमें 70 प्रतिशत सेंटर्स गुणवत्ता के नाम पर मजाक हैं। तो अधिक सक्षम अभिभावकों के बच्चे इंटर साइंस की कोचिंग के लिये पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर आदि बड़े शहरों में चले जाते हैं जिन पर खूब खर्च होता है। इस बार की इंटर साइंस की टॉपर तो बिहार के शिवहर जिले के किसी इंटर स्कूल की छात्रा थी और दिल्ली में रहकर कोचिंग कर रही थी। जो अभिभावक सक्षम नहीं हैं, जिनकी ही संख्या ज्यादा है, उनके बच्चे कोचिंग में एडमिशन नहीं ले पाते। वे भगवान भरोसे रहते हैं। कला विषयों के 90 प्रतिशत बच्चे किसी कोचिंग में नहीं जाते। जागरूक बच्चे घर पर ही पढ़ते हैं, बाकी घूमते हैं, खेलते हैं, आजकल मिल रहे फ्री डाटा को एंजॉय करते हैं। परीक्षा के समय गेस पेपर्स खरीद कर नकल के भरोसे परीक्षा केंद्र पर पहुंच जाते हैं।

बुरा हो उस नामुराद पत्रकार का, जिसने दो वर्ष पहले नकल का एक हैरतअंगेज फोटो खींच कर छाप दिया, जो दुर्भाग्य से देश-दुनिया में वायरल हो गया। राजा को शर्म आई। नतीजा... फरमान जारी हुआ कि अब नकल बंद। एसपी, कलक्टर को एक्टिवेट कर दिया गया, शिक्षकों को नकल रोकने की सख्त ताकीद कर दी गई। राजा ने यह नहीं सोचा कि बिना पढ़ाई के बच्चे जब बिना नकल के परीक्षा देंगे तो क्या हाल होगा। तो...हाल सामने आने लगा। तीन चौथाई से अधिक बच्चे फेल...। फेल हुए बच्चे अपने घर, गली, मुहल्ले में शर्मसार। कोई ट्रेन से कट कर जान दे रहा/रही है, कोई सल्फास का टेबलेट निगल रहा/रही है। किसी की शादी टूट रही है तो कोई घर से भाग रहा है। जब तक नकल का सिलसिला आम रहा, तमाम विसंगतियां दबी-ढकी रहीं। नकल रुकी, सारी विसंगतियां सामने हैं। परीक्षा के दौरान नकल रोकने के नाम पर वीक्षक की भूमिका निभाते शिक्षकों का ह्यूमिलियेशन, बेदर्दी के साथ बच्चों को एक्सपेल्ड करने, बच्चों को गिरफ्तार कर हाजत में बंद करने, उनसे भारी जुर्माना वसूलने आदि की खबरें अखबारों में छाई रहती हैं। परीक्षा केंद्र पर ताबड़तोड़ निरीक्षण को पहुंचते छोटे-बड़े तमाम अधिकारी ऐसे पेश आते हैं जैसे उन्होंने नकल रूपी अधर्म और पाप को रोकने के लिये ही इस धराधाम पर अवतार लिया है। वीक्षकों के साथ उनका बर्त्ताव असम्मानजनक और बच्चों के साथ बेहद बेदर्द होता है। अनेक परीक्षा केंद्रों पर हंगामे होते हैं, अभिभावक पथराव करते हैं, गाड़ियां तोड़ दी जाती हैं, अधर्म का नाश करने आए अधिकारी पिट जाते हैं। लेकिन...राजा का फरमान है...नकल नहीं तो नहीं। कुछेक जिलों में, पॉकेट्स में कुछ अधिकारियों की दया/नेगलीजेंस से कुछ छूट मिल जाती है तो उस जिला का रिजल्ट कुछ सुधरा सा आता है जो पूरे राज्य के औसत को कुछ बेहतर बना जाता है। वरना, 80 प्रतिशत बच्चे तो फेल ही होंगे। रिजल्ट निकलता है तो हाहाकार मचता है। मूल्यांकन की गड़बड़ियां सामने आती हैं। जो बच्चा आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास कर चुका होता है उसे फीजिक्स में महज 2-5 अंक आने के वाकये सामने आते हैं। किसी को पूरी परीक्षा देने के बावजूद "फुल्ली एब्सेंट" घोषित कर दिया जाता है। हजारों बच्चों की अपनी-अपनी शिकायतें, अपनी-अपनी परेशानियां। परेशान, हलकान बच्चों का हुजूम बोर्ड आफिस पहुंचता है। गेट बंद, हड़काते संतरी, नदारद हाकिम...। बच्चों का धैर्य जवाब दे जाता है। फिर तो...हंगामा, लाठीचार्ज, सिर फटना, हाथ टूटना, चैनल वालों की दौड़-भाग। राजा फिर नाराज। अधिकारियों की मीटिंग दर मीटिंग। सारा ठीकरा शिक्षकों पर फोड़ने की कोशिशें। जनता की नजरों में शिक्षकों को बदनाम करने वाले बेवजह के बयान। फिर मामला थमने लगता है। फिर. अगले वर्ष की परीक्षा की तैयारियां शुरू। बच्चों के अगले बैच को जिबह करने की तैयारियों में सरकारी अमला जुट जाता है। राजा को तो और भी बहुत काम हैं। आखिर वे नाराज होने के अलावा कितना टेंशन लेंगे...?

इसी प्रकार के लाखों सवाल और आलेख पढ़ने को मिल रहे हैं। ऊपर का दो काँलम उन्हीं आलेखों का ही एक संकलन संग्रह है। जब से भारत में जुमले और फेंकू सरकारों के चलन बढ़े हैं, वहीं से प्रत्येक राज्योंं में आँखों में आँखे डालकर झूठ बोलने की कवायत शुरू हो गई हैं। इसी क्रम का हिस्सा पिछली बार रहे थे, भाजपा के कदावर नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी। पिछली बार वो सरकार में नहीं थें और रिजल्ट पर कहा था :- "छात्रों को आंदोलन करने चाहिए"। यह वह बिहार के माननीय उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी जी है जिन्होंने पिछली साल अपील किया था कि बच्चे सड़क पर आएं और आंदोलन करें। इस बार उससे भी बदत्तर रिजल्ट आने के बाद अच्छे दिन अपना लाने वाले बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी (उप मुर्खमंत्री) बन कर छात्रों पर लाठीचार्ज करवा रहे हैं। सुशील मोदी का चरित्र इसी से स्पष्ट हो गया कि यह व्यक्ति का अपना कोई व्यक्तित्व नहीं है। यह मोदी भी बड़े मोदीजी के ही छत्रछाया में पले बढ़े दिख रहे हैं या दोनों के गुरूदेव एक ही है। सत्ता मद में ऐसे चुर हुए हैं कि अब सब कुछ सामान्य लग रहा है और छात्रों का आंदोलन उनका अपमान बन रहा है। दोनों मोदीजी मिलकर युवाओं के साथ खिलवाड़ करने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। बड़ा मोदी जहाँ हिंदुत्व के नाम पर असंख्य तरह की हिंदू संगठनों को जन्म दिला दिया और बाद में उन्हें ही गुण्डें कह दिये। उसी स्वरूप में छोटे मोदी की बुद्धि अपने चरम पर नजर आती हैं। शिक्षा में सुधार की दूर दूर तक संभावना नहीं दिखती हैं तो कारण हैं लोगों को जातियों, धर्मों में व्यस्त रखना। शिक्षा के लिए अनपढ़ों द्वारा शिक्षा नीति बनाई जा रही हैं। बिहार के छात्रों में बहुत बड़ी कमी हैं कि वह आंदोलन खुद प्लान नहीं करती हैं। राजनीतिक दलों की दलाली और प्लानिंग में फँस रहे हैं छात्रों पर राजनीतिक दलों का पट्टा लगा हैं जो दुर्भाग्यपूर्ण हैं। जिससे बिहार ही नहीं संपूर्ण भारत में आज तक एक शिक्षा आधारित आंदोलन नहीं हो पा रहा है। जब तक बिहार के छात्र भाजपा के कदावर नेता सुशील मोदी की बातें नहीं मानेगी तब तक छात्रों का छात्र बने रहना बहुत मुश्किल होता दिख रहा है। छात्रों को एक बार फिर याद करने की जरूरत है कि विपक्ष में रहते हुए सुशील मोदी ने क्या कहा था। उसी को एकबार बहुत ही सरल भाषाओं में परिभाषित करने का प्रयास कर रहा हूँ। सुशील मोदी ने कहाँ था कि -"बिहार के छात्र को एकता का परिचय देते हुए छात्र आंदोलन करना चाहिए। घर की जगह सड़कों पर उतरने की जरूरत है।" शायद बिहार के छात्रों को अब भी बातें समझ नहीं आती हैं तो शायद ईश्वरीय शक्ति भी बिहार का भला नहीं कर सकता हैं। याद करिए कि भारत सरकार में गठबंधन में रालोसपा के केन्द्रीय राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने भी पिछले कुछ समयों से यह संदेश दिया है और आज भी इसी लड़ाई को अपने ही मंत्रालय से लड़ रहें है। अगर बिहार या भारत की जनता समझती हैं कि उन्हें जो बातें बताई जा रही हैं सरकारों के माध्यम से हर विभाग के भारत सरकार के मंत्री उसके विरोधी हैं। उपेंद्र कुशवाहा जो शिक्षा विभाग के मंत्री है, एक कहने के लिए शिक्षाविद् भी यानी प्रोफेसर भी है, लेकिन बुद्धि में पूर्ण रूप से दिमागी बुखार के शिकार नजर आते हैं। भारत एवं बिहार के छात्र किस पर भरोसा कर रहे हैं जो खुद पर भरोसा नहीं करता हैं। जो खुद गुमराह है और छात्रों को और तेजी से दलदल में धकेल रहा है।

इस संबंध में कुछ सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षकों से बातें हुई तो बताते हैं कि सरकारों में इच्छा शक्ति नहीं है और अगर भारत पढ़ लिया तो मोदी, योगी, लालू, नीतीश, पासवान, कुशवाहा, माया, मुलायम, जैसे सामाजिक सुरक्षा के नेताओं को कुत्ते भी नहीं पुछेंगे। इनकी इच्छा शक्ति ही नहीं है कि बिहार या भारत पढ़े, वो चाहते ही नहीं है कि कोई अपनी बुद्धि का प्रयोग करें। वैशाली जिले के निवासी एवं सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता ई. रविन्द्र कुमार सिंह (अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा- कार्याकारी अध्यक्ष) ने कहा है शिक्षा व्यवस्था के लिए हम सब जिम्मेदार हैं। हम ऐसे नेताओं को चुनते हैं जो झूठ बोलते हैं। जाति, धर्म के नाम पर समाज का प्रतिक्षण बाँटते हैं। कभी कोई "भूरा बाल" साफ करों तो कभी "मुस्लिम रहित" भारत और सामाज में मानवता विहीन बनाने का दम भरते हैं, लेकिन आज तक ये सब कुछ नहीं करते। ये सभी लोग यहीं कर पाये है कि समाज को जाति, धर्म, समुदाय आदि में रोज बाँट कर गुमराह कर रहे हैं। हमारे समाज में बढ़ रहे शिक्षा की दलाली से युवाओं का भविष्य अंधकार में बदल रहा है। भारत सरकार से लेकर राज्यों की सरकारों में इच्छा शक्ति के अलावा मौलिक अधिकारों की समझ नहीं है। अनपढ़ राजनेताओं के नेतृत्व में भारत और राज्यों का निरंतर सामाजिक और न्यायिक स्तर विलुप्त हो गया है। राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदों में विद्यालयों का योगदान बढ़ा हैं। जिसके कारण ही प्राईवेट विद्यालय अपनी मनमानी करते हैं और उन्हें कोई रोकने वाला था। हर साल नई सिलेबस, हर साल नई किताबों का दौड़, हर साल नये ड्रेस कोड, हर साल नये प्रकार के जुते और मौजे, हर साल एक नया बैंग और नया लोगों, हर साल नये गाड़ियों, बैनर और पोस्टर में नये चेहरें को ठेके पर देकर लुभाने का प्रयास। हर साल 50%-100% तक कक्षाओं के फीस बढ़ाये जाते हैं, वहीं नामांकन के नाम पर लाखों रूपये डोनेशन में ठगा जाता हैं। यह सब प्लान के तहत सरकारी विद्यालयों को नष्ट कर बनाया जाता हैं। पुस्तकों, ड्रेस आदि की दुकानों का भी ठेका चलाया जाता हैं। बच्चों में शिक्षा का स्तर, संस्कारों का स्तर बदल गया है। पढ़ाई का समय ऐसा है कि सोये बच्चों को नींद में ही विद्यालय बुलाया जाता हैं। जिससे वह उचित आहार ग्रहण नहीं कर पाते हैं और बच्चों का समुचित विकास नहीं हो पाता हैं। इतनी समस्या जानबूझकर पैदा की गई हैं, इसलिए अब गाँधीयन की तरह एवं भगत के सिद्धांतों के साथ आंदोलन करना चाहिए। हम भी कहते है कि सुशील मोदी की बातें बिल्कुल सही है कि मोदीजी की बातों को मानकर इस बार ऐसा आंदोलन करेंगें, जो बिहार ही नहीं भारत का शैक्षणिक व्यवस्थाओं को बदलेगा। बिहार सरकार की बिहारी शिक्षा व्यवस्था इस तरह से अच्छी की जा सके, जिससे सरकारी स्कूल और सरकारी व्यवस्था सही हो और शिक्षा के मामले में जो लोग राजनीति करते हैं उनका मुंह बंद कराया जा सके। आंदोलन का रूप दे और अपनी आवाज को बुलंद करें। हम सभी कार्यकर्ताओं से अपील करते हैं जो राज्य हित में शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा विचार, अच्छा सोच रखते वह सभी छात्र एक संगठन, एक मंच पर आकर छात्रों के प्रति आवाज़ उठाएं और इस आवाज को आंदोलन का रूप दे। इसके लिए हम एक जनसंपर्क चलाने पर विचार कर रहे हैं। जिसकी जानकारी जल्दी ही स्कूलों, काँलेजों एवं सभी प्रकार के शिक्षण संस्थानों तक पहुँच कर सिद्धांतिक रूप से दिया जाएगा। आगे ई. रविन्द्र बतातें है कि हम कैसे देश में हैं जहाँ सत्ता भोगियोंं ने अपनी सीटों को भरने के लिए अधिक छह माह का समय निर्धारित किया, चाहे वह राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सासंदों, विधायकों का हो या देश के सबसे छोटा राजनीतिक पद एक पंचायत का अंतिम पद वार्ड सदस्य का ही क्यों ना हो। दलाली के लिए और दलाल जन्म देने का सारा पद छह माह में भरा जाता हैं। वहीं भारत की जनता के लिए जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक जैसे पद भी राज्यों के पदाधिकारियों को ठेके पर दे दिया हैं। लेकिन आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की पूर्ति नहीं कि जाती हैं। वहीं आम आदमी के लिए मूलभूत सुविधाओं में शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, कृषि, भोजन, हवा, पानी, बिजली आदि पर सिर्फ वादें और जुमले फेंकूओं द्वारा फेंंका जाता हैं। वहीं वैशाली के घटारो हाईस्कूल से सेवानिवृत्त प्राचार्य श्री नृपेंद्र कुमार शर्मा बताते हैं कि जबतक मैं घटारो हाईस्कूल में 12वीं स्वीकार नहीं किया। मेरी शर्त होती थी कि पहले विद्यालय में बुनियादी सुविधाओं एवं ढाँचों का निर्माण हो, फिर योग्य शिक्षकों की बहाली तभी मैं अपने उपर जिम्मेदारी लूँगा। सरकार की गलत नीतियों का विरोध करता रहा, लेकिन जैसे ही मैं सेवानिवृत्त हुआ वैसे ही वर्तमान प्राचार्य को भी जबरन कोड दे दिया गया। वहींं विद्यालय ने जल्दी-जल्दी में 12वीं में नामांकन भी शुरूआत कर दिया। दुर्भाग्य है इस बिहार का कि हाथी पहले खरीदा जाता है और चारा की व्यवस्था पर पाँच साल बाद सोच़ा जाता है। वहीं हालात है बिहार में शिक्षा व्यवस्था का, स्कूलों को माध्यमिक से उच्चतर में सिर्फ कागजों पर बदल कर सरकारें पीठ थपथपा रही हैं। जहाँ पहले शिक्षकों की व्यवस्था हो जानी चाहिए थी वहाँ ठेके पर शिक्षा को डाल दिया गया है। श्री शर्मा बताते हैं कि बिहार में गेस्ट टीचर की बहाली के लिए बातें चल रही हैं उसमें भी बड़ा ड्रामा हैं। वैशाली में गेस्ट टीचरों की जरूरत की सूचि माँगी गई हैं, तो पता चला है कि सिर्फ और सिर्फ साइंस विषय के लिए ही अभी सर्वे कर रिपोर्ट देना हैं। हद है कि सरकार और ब्यूरो क्रेट्स क्या करना चाहते हैं। हर विषय के लिए शिक्षक देने में भी राजनीतिक सोच़ हैं। शिक्षा में आरक्षण देकर भी समाज को अंधेरे में धकेला जा रहा है। अनपढ़ो की टोली तैयारी में हैं। श्री शर्मा ने बताया कि यह तो वैशाली सिर्फ नमुना हैं, लेकिन कमोवेश उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों की पूरी बिहार में यहींं स्थिति है। शिक्षा व्यवस्था को चौपट करने में सरकारें कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। आने वाले समय में भोजन, पानी की तरह ही शिक्षा के लिए भी लोग भटकते नजर आयेंगे। वहीं सामाजिक स्तरों पर सर्वे में स्पष्ट हो जाता हैं कि आज छोटा-छोटा नमूना प्राईवेट विद्यालय के माध्यम से नजर आ रहा है। बिहार में ही शिक्षा प्राप्त कर रहे एक ही वर्ग के लिए 10,000 (दस हजार) से ज्यादा अलग-अलग पुस्तकें पढ़ाई जा रही हैं। सभी प्राईवेट विद्यालयों के अपने अपने पुस्तकें हैं। ढंग से देखा जाए तो प्रत्येक जिले में प्राईवेट विद्यालयों की संख्या लगभग 1000(एक हजार) से उपर ही होंगी और शायद ही किसी वर्ग का पुस्तक एक दूसरे से मेल खाता होगा। कौन ठेकेदारी दे रहा है शिक्षा का और कौन सी शिक्षा का पैमाना तय कर रही हैं सरकारें। अब वह समय आ गया है कि लोगों को अपनी अपनी छोड़कर राष्ट्रीय स्तर पर सोच़ बनाने की जरूरत है। यह जरूरत इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम हथियार कितना बढ़िया खरीद रहे हैं।

13-Jun-2018 11:52

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