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Blog >> राजनीति >> शिशिर शर्मा

हम तो पूछेंगे........

सत्ता का गुरूर......

आज तिल तिल कर अपने अस्तित्व को ज़िंदा रखने के लिए मजबुर कांग्रेस की किसी ज़माने में तूती बोलती थी। तमाम गलतियों एवम् उसके गलत फैसलों के बावजूद भी इस देश के सम्पूर्ण जनमानस ने उसे सर आंखों पर बिठाया था। 1916 के मुस्लिम लीग के समझौते से लेकर 1920 के खिलाफत आंदोलन के समर्थन तक, एवम् 1940 के लाहौर अधिवेशन में अलग पाकिस्तान के प्रस्ताव से लेकर 1946 के डायरेक्ट एक्शन तक। हर जगह कांग्रेस ने गलतियों पर गलतियां की। ये अलग बात है कि मोहम्मद अली जिन्ना और वाल गंगाधर तिलक के व्यक्तिगत संबंध मधुर थे। सन 1916 में जो मुस्लिम लीग और कांग्रेस नजदीक आए उसका एक छोटा सा कारण यह भी रहा होगा।

उस दौर में तिलक ने तीसरी पार्टी से लड़ाई का हवाला देते हुए कहा था ,कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। उसके बाद तो कांग्रेस ने हद ही कर दी। सन 1935 में पृथक देश की मांग करने वाली मुस्लिम लीग के साथ मिलकर कई जगहों पर अंतरिम सरकार का गठन किया। इतना ही नहीं 1940 के लाहौर अधिवेशन में अलग पाकिस्तान के संबंध में जो प्रस्ताव पास हुआ उसकी अध्यक्षता भी स्वयं पंडित नेहरू ने ही की थी। कुछ इसी तरह मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस, चूहे - बिल्ली का खेल खेलते रही। उसके बाद 1946 में मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन से लेकर लगातार 1947 में सत्ता हस्तांतरण तक कांग्रेस का संदिग्ध चेहरा और लगातार की जाने वाली गलतियां इतिहास में दर्ज हो गईं।

बावजूद इसके इस देश के लोगों को लगा कि देश को आज़ाद कराने वाली कांग्रेस ही है , लिहाज़ा इसे सर आंखों पर बिठाया। अब 1948 से लेकर कांग्रेस की गलतियों को अगर देखा जाए तो 1962 तक लगातार कुछ न कुछ इस पार्टी की सरकार ने ऐसा किया ,जो कि देश हित में नहीं था। जैसे कश्मीर समस्या, संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर प्रस्ताव, पाक अधिकृत कश्मीर, एक बड़े भूभाग पर चीन का कब्जा। आदि आदि। हालांकि लाल बहादुर शास्त्री जी और इंदिरा जी के कार्यकाल में बहुत कुछ देश हित में भी हुआ। लेकिन एक खास वर्ग की राष्ट्र विरोधी जमात, जिन्हें आज आप फन फैलाए देख रहे हैं, उनका पालन पोषण भी इसी पार्टी की सरकार के दौर में हुआ। जनता भी इस बात को बखूबी समझती थी , लेकिन उन बातों पर बहुत ज़्यादा भरोसा न करते हुए खास तौर पर देश के आम लोग कांग्रेस के प्रति इतनी संजीदा थी कि कांग्रेस पार्टी की सरकार में ही वो अपने देश का भविष्य सुरक्षित मान रही थी।

उस दौर में न तो उसने इस देश के बहुसंख्यक आबादी की परवाह की और न ही इस देश की संस्कृति और अस्मिता की परवाह उसे रही।फिर भी सारी गलतियों को झेलते हुए जनता ने उसे सर आंखों पर बिठाए रखा। यही वो दौर था जब देश में राष्ट्र विरोधी ताकतें पूरी तरह से अपनी जड़ें जमा चुकी थीं। लेकिन सत्ता की हनक के सामने किसकी हिम्मत कि कोई एक शब्द भी इनके खिलाफ निकाल सके। और ऐसी हनक हो भी क्यों न? जिसके लिए इस देश के अधिकांश लोग, चाहे वो ग़लत हो या सही। उसके पक्ष में किसी की सुनने को भी तैयार नहीं थे। तो सत्ता का गुरूर तो लाजमी ही था। लेकिन कहा जाता है न कि भारत देव भूमि है, लिहाज़ा यहां इसके अस्मिता से खिलवाड़ का खेल बहुत ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सकता। परिणाम आप खुद ही देख लीजिए। इस देश की अस्मिता से खिलवाड़ की कैसी कीमत कांग्रेस को चुकानी पड़ी है। इस बीच राष्ट्रवादी सिद्धांतों के मूल्यों पर भारतीय जन संघ जो आज की भारतीय जनता पार्टी है - का अभ्युदय हुआ।

वैचारिक स्तर पर पूरे देश में इसका धीरे धीरे फैलाव हुआ, और इसमें देश की कुछ पीढ़ियों ने अपने बलिदान भी दिए। ये अलग बात है कि इस पार्टी में भी वैसे कार्यकर्ता और उनके लोग हाशिए पर हैं। लेकिन इनकी वैचारिक स्थिति और राष्ट्रवादी कार्य करने के इनके वादे के मद्देनजर इन्हें इस देश की जनता ने सर आंखों पर बिठाया हुआ है। हालांकि इन्होंने अपने कुछ कार्यों से देश की जनता को भावनात्मक तौर पर थोड़ा खुश भी करने का प्रयास किया है। ये अलग बात है कि इस पार्टी के उपर भी सत्ता का गुरूर कुछ इस कदर हावी हो चला है कि यहां पार्टी के आम कार्यकर्ता और वैसे दधीचि जो पार्टी के विचारों के फैलाव से लेकर सत्ता तक में स्थापित करने हेतु अति महत्वूर्ण भूमिका निभाई है।

जो की आज यहां भयंकर रूप से उपेक्षित हैं। यहां भी कांग्रेसी कल्चर हावी है। बावजूद इसके जनता ने इन्हें सर आंखों पर बिठाया है। लेकिन आज के दौर में जिस तरह से राष्ट्र विरोधी ताकतें , इस देश में चैलेंज कर रही हैं। उनके खिलाफ वर्तमान सरकार की चुप्पी कहीं देश को महंगी न पड़ जाए।कहीं ये सरकार नोबल लेने के चक्कर में तो नहीं? जिस वजह से ये, इस देश की अस्मिता के खिलाफ काम कर रहे लोगों पर बिल्कुल चुप है। इन्हें तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी से सीखना चाहिए था कि कार्रवाई किसे कहते हैं। मुझे तो अब ये भी शक होने लगा है कि कहीं इनकी चुप्पी इस देश में जड़ जमाए राष्ट्र विरोधी ताकतों के अभियान, जिनका सिद्धांत शुरू से ही द्विराष्ट्र वाद का है। उसमें सफल होने के लिए एक अलग प्रलाप और गतिविधियां न शुरू कर दें और ये सरकार केवल इसलिए चुप बैठी रहे कि इस देश का एक बड़ा वर्ग कहीं इसके खिलाफ न हो जाए। कहीं इस देश को एक बार फिर 1947 का दिन न देखना पड़े। ये आज के दौर का बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल है .....जिसे कोई पूछे या न पूछे। .................... हम तो पूछेंगे

इस बीच राष्ट्रवादी सिद्धांतों के मूल्यों पर भारतीय जन संघ जो आज की भारतीय जनता पार्टी है - का अभ्युदय हुआ

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