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बदली हुई परिस्थिति में हथियार नहीं हास्पीटल हमें बचाएगा

कोरोना महा आपदा के बाद दुनिया की दिषा बदल जाएगी। इस बात की चर्चा विगत कई दिनों से दुनिया के कई चिंतक अपने-अपने ढंग से अपने आलेखों में कर रहे हैं। अभी हाल ही में ब्रितानी स्वतंत्र टिप्पणीकार पाॅल मासोन ने अपने एक आलेख में यह साबित करने की कोषिष की है कि कोरोना आपदा के बाद दुनिया में पूंजावादी व्यवस्था का अंत हो जाएगा। हालांकि वर्तमान दुनिया को देखने से ऐसा नहीं लगता है लेकिन उन्होंने जो तर्क दिया है, उस तर्क में दम है।

मेरे पास ईमेल के माध्यम से हार्डकोर साम्यवादियों के द्वारा प्रकाषित एक पत्रिका ‘‘मजदूर बिगुल’’ भेजी जाती है। इस पत्रिका का मैं पाठक हूं और बेहद तसल्ली से इस पत्रिका में छपे आर्थिक आलेखों को पढ़ता हूं। आज से कुछ दिन पहले उसी पत्रिका में किसी मुकेष असीम का एक आर्थिक आलेख मैंने पढ़ा था। उसने साफ-साफ शब्दों में लिखा था कि पूंजीवाद अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहा है। हालांकि उसने भारतीय परिप्रेक्ष्य में लिखा था लेकिन वैष्विक उदाहरणों के माध्यम से मुकेष ने समझाने की कोषिष की थी। मसलन किसी भी व्यवस्था को खत्म होने के लिए एक बहाना चाहिए। जब ब्रितानी साम्राज्य अपने चरम पर था तो यूरोपीय देषों के बीच भयानक दो-दो भयानक युद्ध हुए। उस युद्ध का तात्कालिक कारण चाहे जो भी रहा हो लेकिन यूरोपियों के द्वारा जो दुनिया में भयानक शोषण किए गए थे यूरोप का वह दोनोें महायुद्ध उसी शोषण के गर्भ से पैदा हुआ था। ब्रितानी टिप्पणीकार पाॅल मासोन वर्तमान कोरोना महामारी की तुलना सन् 1340 के दषक वाले प्लेग से करते हैं। वे लिखते हैं कि जिस प्रकार उस प्लेग ने दुनिया के चित्र को बदल कर रख दिया था उसी प्रकार कोरोना महामारी दुनिया के आर्थिक चित्र को बदल कर रख देगा। जिसकी शुरुआत प्रारंभ हो चुकी है। वे आगे लिखते हैं कि प्लेग के कारण सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ दुनिया भर में बिद्रोह हुआ था और अंततोगत्वा सामंतवादी व्यवस्था का अंत हो गया। कोरोना के कारण भी दुनिया के कई प्रभावषाली देषों में उसी प्रकार के बिद्रोह होंगे और पूंजीवादी व्यवस्था जो आज दिख रही है वह धरासाई हो जएगी।

भविष्य में क्या होगा, इसका चित्र साफ होने लगा है। कोरोना के कारण न केवल आर्थिक ध्रुवों में बदलाव देखने को मिल रहा है अपितु दुनिया के लोगों के जीने का ढंग भी बदलता दिख रहा है। भारत सरकार ने सभी प्रदेष सरकारों से कहा है कि वे बड़े पैमाने पर मास्क और सेनेटाइजर की खरीद करें और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को मुफ्त में बांटे। मतलब आने वाले समय में शासन एक आदेष निकाल कर यह कह सकती है कि जो लोग सेनेटाइजर और मास्क का उपयोग नहीं करेंगे उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह कोई नई बात नहीं है। भारत में ऐसा हुआ है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पूरे देष में आयोडीन नमक को जरूरी बना दिया था। इस शासनादेष के बाद 50 पैसे किलो वाला नमक सीधे 8-10 रुपये किलो बिकने लगा। अब तो उसकी कीमत 18 से 20 रुपये किलो तक है। उसी प्रकार भारत में हर दुपहिया वाहन चालकों के लिए हेलमेट अपरिहार्य बना दिया गया है। जो नहीं पहनेंगे उनके खिलाफ शासन की ओर से कार्रवाई होती है। तर्क दिया गया कि हेलमेट पहनने से दुर्घना कम होगी लेकिन सरकार ने रोड सेफ्टी के नाम पर कुछ भी नहीं किया। अहमदाबाद के तात्कालिक यातायात अयुक्त मोहन झा ने एक बार बताया था कि हमारे पास यातायात अभियंता की घोर कमी है। हम सड़क तो बना लेते हैं लेकिन उसकी वैज्ञानिकता को परखने के लिए हमारे पास न तो तकनीक है और न ही इंजीनियर। यह जो सेनेटाइजर और मास्क के व्यापार का खेल होने वाला है उसमें बड़े पैमाने पर व्यापार छुपा हुआ है। इसमें हेलमेट और आयोडीन नमक के जैसा व्यापाकर भी छुपा हुआ है, जो अभी आम लोगों को समझ में नहीं आ रहा है और संभवतः आने वाले समय में भी समझ में नहीं आएगा लेकिन कोरोना वायरस आपदा के बाद मास्क और सेनेटाइजर वाला जीवन जीने को हमें विवष किया जाना तय है।

दुनिया में सेनेटाइजर, मास्क, दवा बनाने के लिए कच्चा माल, मेडिकल इक्वीपमेंट आदि के उत्पादन में इन दिनों चीन, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और तुर्की ने दुनिया के कई देषों को मात दिया है। यहां तक कि संयुक्त राज्य अमेरिका भी चीन के सामने घुटने टेकने पड़ रहे हैं। दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और तुर्की ने इस व्यापार को बेहद समझदारी से आगे बढ़ाया है। आज के दिनों में ये देष इस क्षेत्र में दुनिया के अधिकतम व्यापार पर अपना कब्जा जमाए हुए हैं।

दुनिया जिस दिषा की ओर जा रही है भारत को भी समझदारी से काम लेना होगा। भारतीय रणनीतिकारों को यह समझना होगा कि अब पारंपरिक हथियार केवल दिखावटी रह जाएंगे। यदि सचमुच में भविष्य के भारत को बचाना है तो पारंपरिक हथियार खरीदने के बदले हम अपने अर्थव्यवस्था को मजबूत करें। हम आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ें और भविष्य के कूटनीतिक युद्ध को समझने का प्रयास करें। अपनी जनता को बचाने के लिए पारंपरिक हथियार नहीं अस्पताल बनाएं। डाॅक्टरों की टीम खड़ी करें और दवा के मामले में आत्मनिर्भर हों। यदि ऐसा नहीं किए तो हमारा यह आर्य भूमि, जो हमारे लिए प्राणों से भी प्यारा है वह खत्म हो जाएगा और हम प्रभावषाली जातियों का गुलाम बनकर रह जाएंगे।

कोरोना महा आपदा के बाद दुनिया की दिषा बदल जाएगी। इस बात की चर्चा विगत कई दिनों से दुनिया के कई चिंतक अपने-अपने ढंग से अपने आलेखों में कर रहे हैं। अभी हाल ही में ब्रितानी स्वतंत्र टिप्पणीकार पाॅल मासोन ने अपने एक आलेख में यह साबित करने की कोषिष की है कि कोरोना आपदा के बाद दुनिया में पूंजावादी व्यवस्था का अंत हो जाएगा। हालांकि वर्तमान दुनिया को देखने से ऐसा नहीं लगता है लेकिन उन्होंने जो तर्क दिया है, उस तर्क में दम है।

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