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Blog >> समाज >> शिशिर शर्मा

हम तो पूछेंगे........

आगे बढ़ते हुए बात करते हैं व्यवस्था में स्थापित लोगों की

आज पूरे देश में तबलीगी जमात की ख़बरें सुर्खियां बटोर रही हैं। लेकिन तबलीगी जमात के कार्य और उद्देश्यों के बारे में आज देश के अच्छे अच्छे लोगों से आप पूछ लें तो वो बगले झांकने लगेंगे। दरअसल इस जमात का उद्देश्य है पक्का मुसलमान बनाना। शरीयत के मुताबिक उसे ढालना। इस जमात के संस्थापक मोहम्मद इलियास को इस बात को लेकर भारी चिढ़ होती थी कि दिल्ली और उत्तर भारत के कुछ इलाकों के मुसलमान हिन्दुओं के जैसे क्यों रहते हैं। उनको इस बात को लेकर भी आपत्ति थी कि ये लोग गोमांस भी नहीं खाते हैं, अपनी चहेरी बहन से शादी भी नहीं करते हैं। वस्तुत: इनका उद्देश्य ही है कि हिन्दुओं एवम् अन्य धर्मों से मुसलमान खुद को बिल्कुल अलग रखें। उनका ये भी कहना था कि उम्मत की स्थापना के लिए परिवार, समाज और यहां तक की राष्ट्र की कुर्बानियां भी देनी पड़ती है ,जो हमें बेहिचक दे देना चाहिए। अब इनके खतरनाक इरादे और देश विरोधी विचारधारा की समझ आपको हो ही गई होगी। दरअसल , खिलाफत आन्दोलन के वक्त गांधी जी का साथ इस जमात को मिला था।

लेकिन 1968 में आर्य समाजी, स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के बाद ये जमात सुर्खियों में आया। आपको शायद मालूम ही होगा कि इस देश में दो तरह की ताकतें आजादी के पूर्व से ही सक्रिय रहीं। एक वो जो राष्ट्र विरोध में एक खास पंथ को फ़ैलाने के मद्देनजर शांति पूर्वक प्रचार का हवाला देते हुए लगातार सक्रिय है। और दूसरा जो राष्ट्रवाद की विचारधारा को आगे बढ़ाने और देश की संप्रभुता को बचाने के लिए सक्रिय है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो पूर्व से लेकर आज तक के लिए भी उपयुक्त समझा जाएगा, वो ये कि हमारे देश में राष्ट्रवादी शक्तियां उभरने से पहले ही कुचल दी जाती रहीं।

उदाहरण के तौर पर सन 1953 में कश्मीर की आवाज उठाने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की संदिग्ध मौत का मामला हो या फिर 1968 में ही इस देश के दो बड़े राष्ट्रवादी स्वामी श्रद्धानंद की हत्या और पंडित दिन दयाल उपाधयाय जी की संदिग्ध हालात में मौत, या सनातन के धर्मगुरु शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती जी को कोपभाजित किया जाना। वजह चाहे जो भी रही हो, लेकिन आज तक इस बाबत न तो किसी ने सवाल उठाया और न ही किसी तरह की कोई जांच हुई।

दरअसल सूबे के बड़े छोटे अधिकारी इनसे ये सोचते हुए इनकी चिरौरी करते रहते हैं कि कहीं उनकी सूबे के मुखिया के सामने इनकी नकारात्मक छवि न बना दी जाय।, और सूबे के मुखिया इन पर इसलिए मेहरबानी दिखाते हैं कि भईया वोट का खेल है , इनके नेटवर्क से थोड़ा प्रसाद हमें मिल जाय तो बेड़ा पार हो जाएगा। इसलिए जबतक ये पद पर बने होते हैं तबतक तो ऐसी केमिस्ट्री का लाभ उठाकर ये ऐसे जिहादी जमात को संरक्षण देते हैं जिससे वो फलता फूलता रहता है। लेकिन जैसे ही ये पद से रिटायर्ड होते हैं, ये खुद भी वैचारिक स्तर पर जेहादी हो जाते हैं। उदाहरस्वरूप आप सब इनके बयानों को देखकर समझ ही गए होंगे। आपको यह भी बता दें कि शांति पूर्वक धर्म प्रचार की बात भी करना एक प्रकार का जेहाद ही है। लेकिन सवाल ये उठता है कि तब की सरकार में तो इनको संरक्षित करने का एक हेतु था। जो वो पूरा कर रही थी। लेकिन अभी की सरकार में ऐसी क्या मजबूरी है?

.... कोरोना के मद्देनजर इतना कुछ होने के बावजूद भी सरकार की ओर से लॉक डॉउन की समय सीमा तो बढ़ाई गई, लेकिन इनके खिलाफ या कार्रवाई के लिहाज से एक भी बयान सरकार का नहीं आना, क्या ये नहीं बताता कि सरकार कहीं इनसे डर तो नहीं गई? या कहीं सरकार में ये भय तो व्याप्त नहीं हो गया कि कहीं एक बहुत बड़ा वर्ग इनके खिलाफ होकर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल तो नहीं हो जाएगा? लेकिन शायद ये उसे नहीं मालूम है कि थोड़ी सी सख्ती होते ही, सांप और सपोले एक ही बार में निकलकर बाहर अा जाएंगे। बहुत ज़्यादा उसे लेकर परवाह की ज़रूरत नहीं है। या फिर दूसरी बात ये कि आखिर कहीं सरकार उल्टा टोपी तो नहीं पहन रही।

वैसे उल्टा टोपी पहनने में माहिर हैं माननीय नीतीश जी। लेकिन अगर आप भी उल्टा टोपी ही पहनना चाहते हैं तो वाजपेई सरकार के हश्र को और आडवाणी जी की दुर्गति को भी ज़रा याद कर लीजिएगा। इन सवालों को कोई पूछे या न पूछे......... हम तो पूछेंगे

इन सवालों को कोई पूछे या न पूछे......... हम तो पूछेंगे

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