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हम तो पूछेंगे.........

तबलीगी जमात के प्रमुख मौलाना शाद कोरोंटेन की मियाद के बहाने जमात के लोगों को बहका रहे हैं।

आज के राष्ट्रीय अखबारों में एक खबर सुर्खियों में थी। वो ये कि तबलीगी जमात के प्रमुख मौलाना शाद कोरोंटेन की मियाद के बहाने जमात के लोगों को बहका रहे हैं। पुलिस की गिरफ्त से बाहर वो कही अपने समर्थक के घर पर ही भूमिगत हैं। जहां पुलिस नहीं पहुंच पा रही। अब ज़रा समझने की ज़रूरत है कि, कभी मौलाना शाद तो कभी जाकिर नाईक तो कभी कोई और, ये जो पूरे देश में हमेशा ऐसे मौलानाओं का चूहे बिल्ली के जैसा खेल तमाशा चलता है, उसके अंदर की बात समझिए।

ये भारत का कोई मीडिया नहीं बताएगा,जिसे आज हम बताने जा रहे हैं। ज़रा गौर फरमाएं..... ऊपर के ये दो तस्वीरों पर। एक हैं बिहार के गृह सचिव और सीनियर आईएएस अधिकारी अमीर सुभानी और दूसरा कश्मीर में कथित हिंसा पर अपनी आईएएस की नौकरी से इस्तीफा देने वाले शाह फैजल। बाकी भी इस देश में ऐसे कई अधिकारी हैं। चूंकि ये आईएएस कर गए इसलिए आप इन्हे बहुत काबिल समझने की भूल मत कीजिए।दरअसल ऐसे लोग ट्रिक्स से आईएएस बन जाते हैं। अब ज़रा उस ट्रिक्स को समझिए।

यूपीएससी की परीक्षा में पीटी सबको पास करना होता है। लेकिन उस परीक्षा का फाइनल रिजल्ट मेंस और इंटरव्यू दोनों के अंक जोड़ कर के निकाले जाते हैं। अब आमिर सुभानी जैसे इस वर्ग के कई छात्र मेंस की परीक्षा के लिए अरबी ले लेते हैं। अब आपको मालूम ही है कि अरबी भाषा की कॉपी कौन जांचेगा। लिहाज़ा अपने कौम के लड़कों को सिस्टम में पदस्थापित करने हेतु कॉपी जांचने वाले द्वारा बंपर नंबर दिया जाता है और अगर इंटरव्यू में उनके अंक थोड़े कम भी आए तो मेंस उनका बेड़ा पार लगा देता है।

कोई अधिकारी अलगाववादियों के समर्थन में इस्तीफा दे रहा है तो कोई अधिकारी तबलीगी जमात का अघोषित लीडर ही है। तभी न सिस्टम को समझते समझते जाकिर नाईक इस देश से फरार हो जाता है। मौलाना शाद समय रहते पुलिस के सामने से भूमिगत हो जाता है।एकदम से ये सब कैसे हो जाता है? आखिर जड़ें किस हिसाब से जमी हैं , इसका अंदाजा आप खुद लगाइए। क्योंकि मंत्री जी तक फीडबैक पहुंचते पहुंचते, आंख बंद और डिबिया गायब। लेकिन भारतीय मीडिया इन तथ्यों को आपके सामने लाने की जुर्रत नहीं करेगा। लेकिन मैं कहता हूं कि भारत सरकार एवम् अन्य राज्य सरकारों के लिए ऐसे अधिकारियों को पूरे देश भर में जांच कर चिन्हित करने एवम् इनके उपर निगरानी रखने की जरूरत है। लेकिन हालात तो ऐसे हैं कि ये अधिकारी सरकार की नज़रों में मोस्ट क्रेडिबल बने बैठे हैं।

उदाहरण बिहार में ही ले लीजिए न। अब थोड़ा सा इस से अलग होकर भी देखिए। बिहार का एक सबसे पॉपुलर हॉस्पिटल है पटना स्थित पारस हॉस्पिटल। इसमें डॉ हई कैंपस है। यहां चुपके से जमात के लोग आते हैं ।कोरोना के लिए ये उस जमात के लोगों का सबसे सेफ जगह है। सरकार और सिस्टम के नज़रों से दूर। यहां अल्लाह को भी प्यारे हो गए तो किसी को कानोंकान खबर तक नहीं कि मरने वाला इंफेक्टेड भी था।

ताकि सरकार कोई एहतियातन भी ले सके। अब डॉ हई का रसूख तो किसी से छुपा है नहीं। इन सब बातों से आप समझ ही गए होंगे कि सिस्टम में इनकी जड़ें कितनी गहरी हैं। चाहे उच्च अधिकारी हो या उच्च वर्ग इनका काम ही होता है ऐसे इस्लामिक जमात का किसी भी स्तर तक जा कर संरक्षण देना। चाहे उनकी गतिविधि संदिग्ध भी क्यों न हों या फिर उनके तार इस देश को तबाह करने वाले आतंकवादियों से भी क्यों न जुड़े हों। ये सवाल कोई उठाए या न उठाए।......... हम तो पूछेंगे।

मैं कहता हूं कि भारत सरकार एवम् अन्य राज्य सरकारों के लिए ऐसे अधिकारियों को पूरे देश भर में जांच कर चिन्हित करने एवम् इनके उपर निगरानी रखने की जरूरत है।

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