23-Jan-2020 10:31

बुढ़िया माई और बरहम बाबा

वरिष्ठ फिल्म पत्रकार और बिग गंगा चैनल के एंकर अनूप नारायण सिंह का यह संस्मरण आपके दिल को छू लेगा कैसे आज भी गाँव से जुड़ा हुआ है दिल का कनेक्शन

पत्रकारिता करते हुए बीते दिनों को याद करना इन दिनों जैसे रुटिन का हिस्सा बन गया है। गंडक नदी की एक उपधारा घाघोरी के कछार पर बसे अपने गांव में आपका पत्रकार बीस साल पीछे अपने बचपन में खो जाने की जिद करने लगा है। यादों में वह एक बरगद पेड़ को फिर से जानने की कोशिश करने लगा है, जिसे आस पड़ोस के गांव-देहात के लोग पूजने आया करते थे। नाम था उसका ‘बुढ़िया माई’। पेड़ किस तरह लोगों को और गावों को जोड़ता है, हमने इसे ग्रामीण परिवेश में ही सीखा। शायद गांव कनेक्शन यही है क्योंकि गांव हमें जोड़ना सीखाता है न कि तोड़ना।

बचपन में घाघोरी पर बने पुराने पुल को पारकर दुर्गा पूजा में लगने वाले मेले में दाखिल होने से ठीक पहले एक पुराने बरगद पेड़ पर लाल, उजले, हरे रंग के कई कपड़े टंगे दिखते थे। बैलगाड़ी से उतरकर लोगबाग आंखे मूंदकर बुदबुदाते थे और फिर कपड़े के कुछ-एक टुकड़े पेड़ की डाली में बांध देते थे। न अगरबत्ती की सुगंध न कोई दीप लेकिन इसके बावजूद भी यह पूजा की एक पद्दति थी, जो आज भी है। इन दिनों अपना मन बुढ़िया माई के आसपास चक्कर लगाने लगा है खुद को 20 साल पीछे रखकर आज बुढ़िया माई को याद करने का जी कर रहा है।

खेत की पगडंडियों पर चलते हुए आज यादों में अपनी दुनिया रचने की इच्छा है। घाघोरी पर बने पुल पर पहुंचने से पहले एक मकान दिखता था, लेकिन हमें तो अरना जाना होता था। हमारी बैलगाड़ी आगे निकल पड़ती थी। राजापट्टी के पास से गुजरते हुए मन में अजीब से छनछनाहट दौड़ पड़ती थी। । फुटबॉल मैच का आयोजन होता था, कुश्ती के अखाड़े लगते थे। लेकिन अभी मेरी याद में ड्योढ़ी से अधिक वह बरगद का पेड़ ही नाच रहा है। लोग बाग और अंचल की स्मृति को खंगालने के बाद पता चला कि हमारे इलाके में मंदिर मस्जिद से दूर 'ऊपरवाला' गाछ-वृक्ष में वास करता आया है। काली मंदिर भी काली-थान कहलाती है। जमीन के एक छोटे से टुकड़े में खड़ा एक बूढ़ा पेड़ 'बरहम बाबा ' जाने कब बन गया, पता नहीं हैं। यहां इतिहास स्मृति की पोथी में बैठ जाती है, जिसे खंगालना पड़ता है।

जानकर कहते हैं कि अभी भी पू्र्णिमा की रात सफेद घोड़े पर ब्रह्म (देवता टाइप) आते हैं, उन्हीं का है यह 'बरहम थान'। मैं अक्सर पू्र्णिमा की रात उस रास्ते में गुजारने की कोशिश करता हूं, ताकि महसूस कर सकूं अंचल की स्मृति को। गांव देहात की स्मृति यही है। यहां दिखावा कुछ भी नहीं है। लोगबाग जीवन को यहां जीते हैं खेत-पथार के लिए..अन्न के लिए। मेरी बुढ़िया माई की कहानी भी उसी स्मृति की श्रेणी में आती है। दुर्गा पूजा के आठवें दिन यानि अष्टमी को लगने वाले मेले में दाखिल होने से पहले लोग बुढ़िया माई के पास पहुंच जाते थे, मन्नतें मांगने। ‘ मन्नतें पूरी होने पर लोगबाग उस बरगद पेड़ के किसी टहनी पर एक कपड़ा टांग देते थे, नए कपड़े नहीं पुराने। पता नहीं इसकी शुरुआत कैसे हुई होगी लेकिन अध्ययन करने पर कई कथाओं को विस्तार मिल सकता है। हम इसकी शुरुआत कर सकते हैं, यादों को सहेज सकते हैं। छपरा जिले के मशरख प्रखण्ड के एक गाव जो मेरी जनम भूमि भी है से जुड़ी यादे।

23-Jan-2020 10:31

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